उत्तर प्रदेश में प्रथम दो चरणों के चुनाव संपन्न हो गए। प्रथम चरण में 15 जिलों में 73 विधानसभा क्षेत्र और दूसरे चरण में 11 जिलों में 67 विधानसभा क्षेत्र थे। यह पूरा क्षेत्र जाट एवं मुस्लिम बहुल माना जाता है। प्रथम चरण में मुस्लिम आबादी का औसत 19।4 फीसद और दूसरे चरण में 34 फीसद प्रति जिला है जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में मुस्लिम आबादी कुल 19।2 फीसद है। इस लिहाज़ से दूसरे चरण में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा है। पूरे प्रदेश में और ख़ासतौर से इन दोनों चरणों में, मुस्लिम मतदाता के मतदान व्यवहार को लेकर काफी उत्सुकता है। क्या मुस्लिम मतदाता इस बार भी परंपरागत तरीके अर्थात भाजपा को हराने के लिए वोट देंगे या उसमें कोई परिवर्तन होगा?
भाजपा हराने के लिए मुस्लिम मतदाताओं का वोट?
ऐसी मान्यता है कि मुस्लिम समुदाय एकजुट होकर और भाजपा को हराने के लिए ही वोट देता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में उनके लिए एक स्पष्ट रणनीति होती है जिसका लाभ उस पार्टी को मिलता है जो भाजपा को हराने के लिए सबसे प्रबल दावेदार मानी जाती है। अतः मुसलमान मतदाता कहीं सपा, कहीं कांग्रेस तो कहीं बसपा या रालोद को वोट देता दिखाई देता है। इसीलिए, सामान्यतः प्रदेश स्तर पर मुस्लिम वोट सभी गैर-भाजपा दलों को मिलता है। लोकनीति, सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार पिछले विधानसभा चुनाव 2012 में सपा को लगभग 40 फीसद, कांग्रेस को 20 फीसद, बसपा को 18 फीसद मुस्लिम वोट मिले। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन क्षेत्रों में अजीत सिंह की रालोद (राष्ट्रीय लोक दल) चुनाव लड़ती है, वहां उसे भी मुस्लिमों के वोट मिलते हैं। भाजपा को भी विधानसभा चुनाव 2007 में 3 फीसद, 2012 में 7 फीसद और लोकसभा चुनाव 2014 में उत्तर प्रदेश में 10 फीसद वोट मिले। इससे ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे कुछ मुस्लिमों का रुझान भाजपा की ओर भी हो रहा है।
मुसलमानों में वर्गीय-विभाजन
इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड के जिन इलाकों में चुनाव संपन्न ही चुके हैं वहां मुस्लिमों का मतदान व्यवहार कैसा रहा? इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं दिया जा सकता क्योंकि उस क्षेत्र में इस बार कई नए कारक काम कर रहे थे। सबसे बड़ा कारक पसमांदा मुस्लिम आन्दोलन का बढ़ता प्रभाव है जो धीरे-धीरे उच्च और कुलीन वर्ग के अशरफ मुस्लिमों के वर्चस्व को चुनौती दे रहा है और जिससे मुस्लिम मतों के एकतरफा किसी एक पार्टी की ओर जाने की संभावना कमज़ोर होती दिखाई देती है।
मायावती की 'सोशल इंजीनियरिंग' में दलित-मुस्लिम गठजोड़
दूसरा कारण मायावती की दलित-मुस्लिम सोशल-इंजीनियरिंग सोने पे सुहागा जैसा है जिसने सबको चौंका दिया है। मायावती ने 2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ से पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। इधर भाजपा नेता दयाशंकर सिंह प्रकरण के बाद बसपा नेता नसीमुद्दीन की उच्च-जातियों के प्रति अभद्र टिप्पड़ी से ब्राह्मण और उच्च-जाति का मतदाता बसपा से छिटक गया जिससे मायावती को एक नए सामाजिक समीकरण की ओर उन्मुख होना पड़ा। लेकिन यदि उनका दलित-मुस्लिम गठजोड़ का दांव सही पड़ गया तो उसका सबसे ज्यादा नुक्सान सपा-कांग्रेस गठबन्ध को होने की संभावना है। पसमांदा अर्थात पिछड़े और दलित मुस्लिम मायावती की बसपा की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं और इसके लिए उन्होंने तमाम मुस्लिम संगठनों से समर्थन भी हासिल कर लिया है जिन्होंने मुस्लिमों को बसपा के पक्ष में वोट करने की अपील की है। इस प्रकरण में सपा के पूर्व-सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का वह बयान भी मायने रखता है जिसमें उन्होंने अपने पुत्र और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर यह आरोप लगाया था कि वे मुस्लिम हितों की अनदेखी कर रहे हैं। चूकि अखिलेश सरकार 29 फीसद मत प्रतिशत पर बनी थी जो अब तक सबसे कम मत प्रतिशत पर बनी सरकार है, इसलिए यदि मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग सपा से खिसक गया तो उनकी सत्ता में वापसी बहुत ही मुश्किल हो जाएगी।
ओवैसी की मुस्लिम मतदाताओं में सेंध और भाजपा को गणितीय लाभ
सपा की मुश्किल को कम करने का कुछ काम उसके साथ कांग्रेस के आने से हो सकता था जो मायावती द्वारा काटे गए उसके मुस्लिम वोटों की भरपाई कर सकता। लेकिन तीसरे कारक के रूप में असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम, पीस पार्टी और मिल्लत कौंसिल ने अनेक सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करके सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। पिछले विधान सभा चुनाव में पीस पार्टी और मिल्लत कौंसिल ने बरेली जिले में एक-एक सीट जीती थी और इस बार ओवैसी की एमआईएम अनेक सीटों पर चुनाव लड़ रही है और यदि वह भी कोई गुल खिला दे तो ताज्जुब नहीं। कम से कम दो दर्जन सीटों पर वे मुस्लिम मतों का विभाजन तो ज़रूर करेंगी। इसका लाभ यदि भाजपा को मिल जाये तो कोई ताज्जुब नहीं।
'तीन तलाक़' का मसला भाजपा को बढ़त दिलाएगा?
इसके अलावां, भाजपा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर तीन तलाक़ को ख़त्म करने के मुद्दे को उठाया गया है। इस मुद्दे को भले ही मुस्लिम धार्मिक और राजनीतिक नेताओं का समर्थन न मिले, पर इससे कहीं मुस्लिम महिलाएं ज़रूर प्रभावित हो सकती हैं और इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनमें से कुछ अपने परिवार के निर्देश और इमामों के फतवों के विरुद्ध जाकर भाजपा के पक्ष में मतदान भी कर सकती हैं। इससे पूरे प्रदेश में भाजपा द्वारा प्राप्त मुस्लिम मतों का कुछ प्रतिशत बढ़ भी सकती हैं।
वास्तव में इन तमाम कयासों का खुलासा तो तब होगा जब आगामी 11 मार्च को मतों की गणना होगी, लेकिन जो प्रारंभिक संकेत है वे मुस्लिम मतदान व्यवहार में कुछ उलट-फेर का संकेत तो ज़रूर दे रहे हैं।    
(लेखक सेंटर फॉर दि स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स (सीएसएसपी) कानपुर के निदेशक हैं)