जैसे ही उत्तर प्रदेश से मुख्यमंत्री पद के लिए महंत योगी आदित्यनाथ के नाम की स्वीकृति और घोषणा हुई, प्रतिक्रियाओं का तांता लग गया। कुछ लोग इस ख़बर से बड़े उत्साहित दिखे, और कुछ लोगों पर जैसे भूत चढ़ गया। वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने अपने ट्वीट में इस ख़बर को ‘फ्रिंज का मेनस्ट्रीम होना’ बताया।
वही स्कॉटलैंड मूल के प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल की प्रतिक्रिया एक अजीब मनोदशा को दिखा गयी जब उन्होंने चुटकी लेते हुए ट्वीट किया कि ‘योगी आदित्यनाथ- पागल, पागलखानों पर कब्ज़ा कर रहे हैं'
हालांकि जिसने भी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक प्रक्रियाओं को नज़दीक से देखा है, वह उपरोक्त लोगों के विचार को सच नहीं मानेगा। इस समाचार में 'चकित' होने जैसा कुछ नहीं है। उत्तर प्रदेश में 'सामान्यतः' और पूर्वांचल में 'मुख्यतः' आदित्यनाथ की लोकप्रियता स्पष्ट रही है। गोरखपुर लोकसभा से 1998 में पहली बार निर्वाचित होने के बाद आदित्यनाथ तब से निरंतर ‘अपने तरह की राजनीति’ करते आये हैं और जमीनी स्तर पर लगन और मेहनत से काम किया है। यह सच है कि आदित्यनाथ कई बार ख़बरों में अपने विवादित बयानों, भाषणों, और कृत्यों के कारण रहे हैं। हालांकि साथ में यह भी जोड़ना उचित होगा कि योगियों को राजनीतिक तौर पर ‘सही’ होना नहीं आता। उनकी राजनीतिक प्रौढ़ता और समझ, कई बार लोकतांत्रिक राजनीतिक में स्वीकार्य नहीं बन पातें। लेकिन जहाँ तक इस योगी की बात है, वे बड़े पैमाने में लोगों को स्वीकार्य हैं, आदरणीय हैं, और अपने समर्थकों में प्रभावशाली हैं। उनके पास समर्थकों का हजूम है।
आइये हम ऐसे पांच कारणों की विवेचना करें जिससे यह मालूम होगा कि क्यों अंततः योगी आदित्यनाथ का चुनाव होना ही था।
‘एक नए भारत’ के लिए ‘एक नयी राजनीतिक संस्कृति’: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वंश राजनीति में दशकों से ऐसे उदाहरण बन गए थे जब पार्टी नेतृत्व की मंशा जनता के बहुमत (मैंडेट) को उलट देती थी। यह उदाहरण कई राज्यों में मुख्यामंत्री के चुनाव से संबंधित है। अभी इतनी देर नहीं हुई कि जनता NCERT राजनीति विज्ञान के पाठ्य पुस्तकों में इंदिरा गाँधी के कार्टूनों का उपयोग भूल जाये। इन कार्टूनों में श्रीमती गाँधी गुड्डे-गुड़ियों से खेलती दिखाई गयी थी, फर्क बस इतना था कि ये गुड्डे कांग्रेस राज्यों के मुख्यमत्री और राज्यपाल हुआ करते थे।
भाजपा ने पार्टी संरचना में नए प्रकार की लोकतांत्रिक ऊर्जा का सृजन किया है। इस पहल में जनता के बहुमत को पार्टी नेतृत्व की मंशा पर तवज्जो दी गयी है। नरेंद्र मोदी के रूप में एक सुप्रीम लीडर होने के बावजूद भी भाजपा ने कभी अन्य लोकप्रिय नेताओं को ऊपर आने से नहीं रोका है। जहाँ कई लोगों के लिए आदित्यनाथ का चुनाव राजनीतिक सत्यता का परिचायक नहीं होगा, वहीँ यह उत्तर प्रदेश की जनता के बहुमत का सम्मान जरुर है। लोकतांत्रिक राजनीति में आप सबसे लोकप्रिय विकल्प को बस इसलिए नहीं नकार सकते क्योंकि आपकी ‘फ्रिंज’ और ‘मेनस्ट्रीम’ की समझ परिभाषित है। लोकतंत्र की यही तो खासियत है कि इसमें ‘फ्रिंज’ और ‘मेनस्ट्रीम’ की कई परिभाषाएं होती है जो काल और स्थान (टाइम-स्पेस) के अनुसार बदलती रहती हैं। लुटियंस दिल्ली के जिन पत्रकारों और विद्वानों के लिए जो शख़्श या समूह ‘फ्रिंज’ है, वही उत्तर प्रदेश की जमीन पर ‘मेनस्ट्रीम’ हो सकता है। सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी उभरती लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में भाजपा ने इस बहुलता का हमेशा से सम्मान किया है। पाठकों को यह याद आये कि जो वर्ग आज आदित्यनाथ के नाम पर ‘लाल-पीले’ हो रहे हैं, 2012-13 में नरेन्द्र मोदी के नाम पर भी उनकी यही प्रतिक्रिया थी।
जीर्ण प्रत्ययों का विरोध: इस फैसले का सम्मान जीर्ण हो चुके प्रत्यय जैसे सेकुलरिज़्म और संप्रदायवाद के विरुद्ध एक पहल के रूप में भी होनी चाहिए। भाजपा नेतृत्व यह भली-भांति जनता होगा कि योगी आदित्यनाथ का नाम सुनते ही बहुत से लोग वापस से सांप्रदायिक उन्माद और उसकी बढ़त की आशंका जाहिर करेंगे। लेकिन फिर भी भाजपा नेतृत्व इस फैसले के साथ आगे बढ़ा। क्यों? ऐसा इसलिए कि जहाँ पुराने दिनों का बौद्धिक वर्ग आज भी किसी एक व्यक्ति/समूह को दूसरे की तुलना में अधिक सेक्युलर/कम्युनल बनाने पर तुला है, वहीँ जनता अब चुनावी वादों की पूर्ति और सुशासन की और देखने लगी है। सेकुलरवाद की खामियों पर अपनी राजनीतिक रोटी सकने वाली पार्टियों ने जिस ‘ब्लॉक वोट’ का अविष्कार किया था, उनकी पोल खुल चुकी है। विभिन्न चुनावी समीक्षाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा को चुनावी विभाजन से दूर हर समूह, वर्ग, जाति और धर्मं से वोट मिले हैं। अतः जनता ने, और मुख्यतः अल्पसंख्यक समूहों ने अब विभाजित एजेंडा के विरुद्ध सुशासन के लिए मताधिकार का प्रयोग करना सीख लिए है।
अब हम आश्वस्त हैं कि आदित्यनाथ का नाम घोषित करके भाजपा ने यह बतलाया है कि अब सेकुलरिज़्म का झूठा एजेंडा और बटवारे की राजनीति नहीं चलेगी। ऐसा भी कोई जो भगवा धोती पहने, योगी और पुजारी भी हो, अगर लोगों को किये वादें निभा सकता है, विकास की राजनीति कर सकता है, तो उसका चुनाव होना ही चाहिए।
बहुमत का सम्मान, अधिनायकवाद नहीं: कई विद्वान और लुटियंस दिल्ली के पत्रकार इस फैसले में अधिनायकवाद का खतरा देख रहे हैं। इस समूह को अब वाकई जनता से संवाद करने की शुरुआत करनी होगी। ‘बहुमत की इच्छा' और 'सहमति’ में अधिनायकवाद के खतरे को देखना गलत है।
संसदीय लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता। आज भी राजनीतिक दलों से यह आशा रहती है कि वो एक सामाजिक अनुबंध में बंधें हुए हैं। लेकिन कांग्रेस के राज में यह महज एक 'जुमला' बनाकर छोड़ दिया गया था। कई बार नेता का नाम कुछ और होता था, लेकिन अंत में नेता कोई और निकले। 2004 में ही सोनिया गाँधी कांग्रेस की स्टार प्रचारक और नेत्री रहीं लेकिन मौका आने पर वो पीछे हट गयीं और सामने मनमोहन सिंह को ला दिया गया, जो कभी किसी की दृष्टि में थे ही नहीं।
भाजपा, कांग्रेसी संस्कृति की देखा-देखी नहीं कर सकती। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि परिवर्तन की जिस चाह में भाजपा को 2014 में अप्रत्याशित बहुमत मिला था, वह बस राजनीति में संस्थागत बदलाव के लिए नहीं, सांस्कृतिक बदलाव के लिए भी था। यह सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश चुनावों में स्टार प्रचारक थे। यह भी ठीक है कि यह अप्रत्याशित विजय मोदी और कंपनी के सुशासन का परिणाम है। लेकिन राज्यों की राजनीति उनके द्वारा आगे बढाई जानी चाहिए, जो उस राज्य विशेष की जमीन पर अपनी पकड़ बनाये हुए हैं। दिल्ली से किसी को भेजना कत्तई उचित नहीं था, जब उत्तर प्रदेश में ही ऐसे जमीनी नेता मौजूद थे।
‘दूसरी पंक्ति’ के नेतृत्व की जरुरत: भाजपा नेतृत्व के लिए बस एक ही व्यक्ति पर निर्भर नहीं रह सकती। उसे ऐसे जन-नेताओं का निर्माण करना होगा जो जमीन की राजनीति में दक्ष हों। पार्टी के पास पहले से ही शिवराज सिंह चौहान (मध्य प्रदेश) और रमन सिंह (छत्तीसगढ़) के रूप में दो ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी जमीनी साख को सुशासन के बल पर बनाया है। गौरतलब है कि जैसे ही मनोहर परिक्कर रक्षा मंत्री के तौर पर दिल्ली आये, भाजपा के हालत गोवा में बिगड़ते रहें। अतः भाजपा को अब राज्यों में वहीं के जमीनी नेताओं के सहारे अपनी पकड़ और अधिक मजबूत करनी होगी।
उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के बाद जमीनी राजनीतिक नेतृत्व का अकाल पड़ा हुआ था। राजनाथ सिंह भी राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय हो चुके थे। इसे देखते हुए आदित्यनाथ को अपनी राजनीतिक पकड़ ‘मेनस्ट्रीम’ में लाने का मौका दिया जाना चाहिए था। वह सांसद के तौर पर इतने वर्षों से अच्छा काम कर रहे हैं।
अंतरकलह की रोकथाम: यह फैसला भाजपा की उत्तर प्रदेश प्रादेशिक इकाई में किसी भी आतंरिक झगडे का भी निवारण है। दिल्ली से अगर किसी भी और नेता को उत्तर प्रदेश की कम सौप दी जाती तो योगी आदित्यनाथ के लाखों समर्थक जरुर नाराज़ होते। साथ ही पार्टी की प्रादेशिक इकाई में कई प्रकार के अंतर्विरोध सामने आ सकते थे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और उनके सहयोगियों ने आदित्यनाथ के नाम पर मुहर लगाकर दो तरफ़ा फायदा लिया है।
एक और जहाँ उत्तर प्रदेश विधान सभा के भाजपा दल की मंशा का सम्मान करके एक लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान का संदेश दिया गया। वहीं दूसरी ओर किसी भी प्रकार के आंतरिक समस्या की आशंका से छुट्टी भी मिल गयी।
अब जब नए मुख्यमंत्री, अपनी मंत्रीपरिषद के साथ शपथ ग्रहण कर चुके हैं, इसी के साथ एक नई तरह ही राजनीति आरंभ हो चुकी है। हम आशा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ अपने ‘विकास और समर्पण' की राजनीति से भाजपा के लिए 2019 का सफ़र सुगम और सहज बनायेंगे। आख़िरकार दिल्ली रास्ता उत्तर प्रदेश से ही तो आता है!
 
(लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली में आधुनिक इतिहास के छात्र हैं)