उत्तर प्रदेश चुनाव में दम आजमाने वाले दलों और उनके प्रत्याशियों के पास मतदान के बाद अपने नेटवर्क से 'इनपुट' पहले ही आ गया था। अब तो एग्जिट पोल का पिटारा भी खुल गया। टेन्शन मगर जाने का नाम ही नहीं ले रही। आज की रात "कत्ल वाली रात" के सामने खड़े होने का सा अहसास करा रही है। यह रात करवटों में ही कटेगी यह तय है। काश इस रात की सुबह न होती और 11 मार्च को एक झटके में बता दिया जाता कि जीते या कि हारे! इस टेन्शन में होली का मूड बनता है भला!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सात चरणों की लंबी और बोझिल हो चली चुनावी प्रक्रिया 8 मार्च को चालीस सीटों पर मतदान के साथ निपट चुकी है। बची हुई एक सीट अंबेडकरनगर की अल्लापुर पर भी कल वोट पड़ गए। पहले चरण के मतदान में करीब एक माह पहले जिन प्रत्याशियों के यहाँ वोट पड़ चुके थे उनका चुनावी रोमांच भी शायद सातवां चरण आने तक काफी हद तक ख़त्म हो चुका था।

वह रोमांच और साथ में टेन्शन और खौफ अब लौट आया है और ऐसा होना स्वभाविक भी है, 11 मार्च को मतगणना सर पर जो अा गई है। अब नतीजे आ जाएंगे। जिन नतीजों पर अगले पांच साल का सियासी भविष्य दांव पर हो उसका सामना करने से डर तो लगेगा ही। चाहे प्रत्याशी हों या फिर उन सियासी दलों के मुखिया जिनका दांव पर तो और ज्यादा ही लगा है। आज इनके दिन का बड़ा हिस्सा तो एग्जिट पोल के नतीजों की जुगाली करते और मतगणना के लिए अपनी-अपनी पलटन को आखिरी वक़्त तक के जरूरी निर्देश देते फिर भी कट जाएगी। लेकिन रात... रात कैसे कटेगी?

उत्तर प्रदेश के सियासी सूरमाओं के लिए यह रात काट पाना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि गए एक दशक में प्रदेश ने इतनी अनिश्चितता वाला चुनाव नहीं देखा। पिछले दो चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में सीधा मुकाबला था लिहाजा नतीजों से पहले अनुमान लगाना आसान कि कौन बाजी मार ले जाएगा। अबकी भारतीय जनता पार्टी भी ताल ठोक कर चुनाव लड़ी तो कांग्रेस ने भी सपा के साथ गठबंधन कर लिया। ऐसे में अनुमान लगाना बेहद कठिन। जितने विशेषज्ञ उतनी व्याख्याएं! सबका अपना गुणा-भाग। ऐसे में नतीजे आने तक टेन्शन कायम रहेगी और दिल की धड़कनें भी बढ़ेंगी।

बहरहाल, अगले चौबीस घंटे में वोटों की गिनती शुरू हो जाएगी और उसके कुछ घंटों के भीतर यह भी साफ हो जाएगा कि किसे जनता ने नकारा और कौन बना सिंकदर! टेन्शन, धड़कन काफी हद तक कम हो चलेगी। जनता ने किसी को बहुमत न दिया तो आगे की संभावित सियासी जुगलबंदियों की कवायद भी शुरू हो जाएगी। भारत का लोकतंत्र ऐसा ही है। जिसमें इंद्रधनुष सरीखे रंग भरे हैं और उनमें लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव यानी चुनावों का रंग संभवतः सबसे चटख... होली के रंगों से भी गाढ़ा, न्यारा और प्यारा! इसलिए तो टेन्शन वाली कत्ल की रात ढलेगी तो लोकतंत्र के रंगों वाली खुशनुमा सुबह आएगी। इसमें सराबोर होने के लिए हम तैयार हैं, आप भी रहिए!