भारतीय 'राष्ट्रीय' कांग्रेस: देश के सबसे बड़े सूबा और सिर्फ 105 सीटें?
कांग्रेस के लिए सवाल ये नहीं है कि वो कितने पर लड़ रही है बल्कि उनके लिए तो ये महत्वपूर्ण था कि वो कितने पर जीत पाएंगे? इस लिहाज़ से उन्होंने रिलयस्टिक होकर फैसला किया है। मनोवैज्ञानिक रुप से भी उन्होंने सैकड़ा (105) छू लिया है। झारखण्ड में कांग्रेस ने इस बात को पहली बार महसूस किया और बिहार आते-आते कांग्रेस इस बात को समझ चुकी है कि विधानसभा में हमें क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए मैदान छोड़ना होगा तभी पार्टी सर्वाइव  कर पाएगी।
सपा से गठबंधन: मजबूरी या कुछ और?
कांग्रेस के आलोचकों के लिए ये मजबूरी भरा कदम है तो कांग्रेस के समर्थकों के लिए बहुत चतुराई भरा कदम है। जबकि वास्तविकता इसके बीच है। सही बात तो ये है कि चुनाव परिणामों के बाद इतने में भी लग सकता है कि कांग्रेस ने 20 सीटों पर चुनाव ज्यादा लड़ा। अगर कांग्रेस प्रदेश में सपा से गठबंधन न करती तो अकेले उसके लिए दहाई अंक का आंकड़ा छूना मुश्किल था।
क्या राहुल के लिए ये अंतिम मौका है? इसके बाद प्रियंका?
राहुल और प्रियंका में कौन आगे पीछे रहेगा, कौन आगे... ये सब कांग्रेस की आंतरिक कहानियां हैं। नेतृत्व में कभी वैक्यूम  नहीं रहता। (The vacuum of leadership never remains there) जब नोटबंदी का मसला चरम पर था तो आप छुट्टियां मनाने चले जाते हैं। इस बात की क्या गारंटी है कि प्रियंका चल पाएंगी? भारत में आज 70 फीसदी 35 साल के युवा हैं। मीडिया चाहे जो कहे, आज की पीढ़ी अपने आप को गांधी परिवार से नहीं जोड़ती।
आज का युवा काम करने वाले को वोट देता है। मोदी 2002 के कारण 2014 नहीं जीते बल्कि एक सूबे के मुखिया के तौर पर उन्होंने 12 साल तक वो सब कुछ किया, जो युवा चाहता है। शीला दीक्षित हों या नवीन पटनायक या शिवराज चौहान... हर किसी ने काम किया, तभी तीन-चार बार जीते हैं।
कांग्रेस की स्थिति: दोषी कौन?
दरअसल, कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपने आप से किसी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता। हर राज्य में इनके पास नेता हैं लेकिन दस जनपथ के यहाँ एक 'असुरक्षा की भावना' घर कर चुकी है कि फलां नेता लोकप्रियता के मामले में उनसे आगे निकल सकता है। यही हरीश रावत के साथ हुआ, यही पंजाब के कैप्टन के साथ और यही वीरभद्र सिंह के साथ... जो व्यक्ति (कमलनाथ) इमरजेंसी के गुस्से में भी 1977 का चुनाव जीत चुका हो, उसको समुचित मौका नहीं दिया गया?
कांग्रेस में आज भी हर वो शख़्स चुनाव जीत रहा है जिसकी ग्रासरुट में पकड़ है।
कांग्रेस नेतृत्व ने अपने आप को ऐसे लोगों से घेर रखा है कि वो पार्षद का चुनाव नहीं जीत सकते हैं लेकिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्युसी) में बैठे हैं। इनमें से कोई जन-नेता नहीं है।
कांग्रेस नेतृत्व ही नरेंद्र मोदी के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो रहा है। जो लोग मोदी को नहीं भी चाहते, वे भी ऐसे (कांग्रेसी) नेतृत्व से ऊब कर मोदी की तरफ मुड़ जाते हैं।
सपा+कांग्रेस: अंक गणित कितना भारी?
2012 विधानसभा में कांग्रेस और सपा को मिलाकर लगभग 40 फीसदी (29.15, 11.63) मत मिले थे। 2014 में इन दोनों को करीब 30 फीसदी (22.20, 7.50) मिले। अब अगर भाजपा को देखा जाए तो लोकसभा में करीब 43 फीसदी का आंकड़ा उसके पक्ष में है। अब अगर अन्य राज्यों में ट्रेंड देखा जाए तो भाजपा को लोकसभा से राज्यों में विधानसभा में करीब 9-10 फीसदी वोट का नुकसान हुआ है, जो स्वाभाविक भी है। इसी ट्रेंड को अगर हम उत्तर प्रदेश में देखें तो भाजपा का आंकड़ा भी करीब 33-34 के आसपास रहता है। विधानसभा फ़तह करने के लिए हालांकि यह एक अच्छा प्रतिशत है लेकिन चूंकि सपा और कांग्रेस का आंकड़ा भी इसी सीमा तक जा रहा है तो निश्चित ही प्रदेश में एक बहुत ही दिलचस्प और कांटे का मुक़ाबला होने जा रहा है।
लेकिन यहाँ ये बात भी याद रखी जानी चाहिए कि विधानसभा या लोकसभा में 'बफर' वोटर होता है, वही तय करता है कि ऊंट अंततः किस करवट बैठेगा!