हाल ही में मैंने एक फिल्म देखी- दि-मैसेज. यह फिल्म पैगम्बर मोहम्मद की जीवनी है। फिल्म के शुरुआत में ही डिस्क्लेमर जाता है कि फिल्म में पैगम्बर का ना तो चेहरा दिखाया जाएगा और न ही उनकी आवाज़ सुनाई जाएगी क्योंकि इस्लाम में ऐसा करना मना है। उत्सुकता हुई कि बिना किसी का चेहरा दिखाए और बिना आवाज़ के, कैसे किसी का जीवन दिखाया जा सकता है? पूरी फिल्म देखी। मक्का से मदीना तक... पूरा इतिहास, राजनीति और पैगम्बर का वहाँ पर प्रभाव, बेहद सलीके से समझ आ गया। बिना किसी समस्या के।
यह चर्चा आज के भारत में प्रसांगिक हो चली है। आप समझ गए होंगे। चाहे जोधा-अकबर (फिल्म) हो या बाजीराव मस्तानी... भारतीय फिल्मकारों पर इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगता रहा है। इसी कड़ी में राजस्थान में फिल्म निदेशक संजय लीला भंसाली के साथ मारपीट का मामला बड़ी चर्चा में रहा। मारपीट करने वालों के अनुसार भंसाली ने अपनी फिल्म पद्मावती में चित्तौड़गढ़ की रानी के साथ अलाउद्दीन खिलजी के संबंधो को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। हालांकि उनका कहना है कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। लेकिन जैसा कहा गया है न कि धुआं वहीं उठता है जहाँ आग लगी होती है! इस फिल्म के अभिनेता रणबीर सिंह ने मीडिया को बताया कि फिल्म में खिलज़ी और रानी पद्मिनी का किसिंग सीन है। जिसकी पुष्टि कई अन्य तथ्यों से भी हुई है।
तो अब बात उठती है कि आखिर ये हंगामा हु्आ क्यों? चलिए थोड़ा इसकी पृष्ठभूमि में चलते हैं। इस फिल्म की कहानी प्रसिद्द श्रृंगार-रस कवि मालिक मोहम्मद जायसी की रचना पद्मावत से प्रेरित है। जायसी के अनुसार चित्तौड़ की रानी पद्मावती अत्यंत ही रूपवान थी। उनके रूप के किस्से सुनकर खिलज़ी चित्तौड़ आया और किले को घेर लिया। खिलज़ी ने रानी को देखने की मांग रखी। राजा रतनसेन के मनाने के बाद रानी तैयार हुई लेकिन सीधे नहीं बल्कि खिलज़ी को पानी में रानी का प्रतिबिंब दिखाया गया। हालांकि यह सब राजा रतनसेन की सहमति से हुआ था लेकिन रानी पद्मावति की सुंदरता ऐसी कि खिलज़ी को रानी से (एकतरफा) प्रेम हो गया और उसने धोखे से रतनसेन को बंदी बना लिया। लेकिन रानी के आह्वान पर राजपूतों की सेना की टुकड़ी पालकी में बैठकर खिलजी के कैंप में गई, यह कहकर कि पालकी में रानी स्वयं आ रही हैं और खिलज़ी की सेना को धोखा देकर रतनसेन को छुड़ा लिया गया।.बदले में रानी को पाने की इच्छा में खिलज़ी ने दुर्ग पर धावा बोल दिया लेकिन सेना के दुर्ग में घुसने से पहले रानी ने 16000 महिलाओं के साथ 'जौहर' (आग में स्वयं को जला देना) कर लिया।
अब बात आती है कि आखिर इसमें ऐसा क्या है जो इतना विवाद हो गया? हालांकि जायसी की रचना में कुछ यथार्थ है लेकिन इसका एक बड़ा भाग काल्पनिकता है। चित्तौड़गढ़ में पद्मावती नाम की कोई रानी नहीं थी। वास्तविकता में रानी का नाम पद्मिनी था और राजा का नाम रतनसेन नहीं बल्कि रतन सिंह। जायसी की रचना में पद्मावती को सुदूर लंका के राजा की पुत्री बताया गया है, जो यथार्थ से कोसों दूर है। खिलज़ी एक क्रूर शासक था। उसके हरम में कई महिला दासियां थीं जिनका खिलज़ी यौन-शोषण करता था। कहते हैं कि उसका पुरुषों से भी यौन-संबंध थे और उसके पुरुष प्रेमी और सेनापति मलिक काफ़ूर ने ही खिलज़ी की हत्या की थी। रानी पद्मिनी के प्रति उसकी आसक्ति कामुकता से भरी थी, ना कि किसी प्रेमवश...
संजय लीला भंसाली अपनी इस फिल्म के जरिए यह साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि खिलज़ी, जिसने कि अपनी हर जीत के बाद महिलाओं का शोषण किया, चाहे गुजरात हो या राजस्थान, रानी से प्रेम करता था। चलिए मान लिया वो प्रेम करता भी था लेकिन क्या ऐसा प्रेम उचित है? जिसके लिए हज़ारों मेवाड़ के योद्धाओं और 16000 स्त्रियों को क़ुरबानी देनी पड़ी? और भी मान लिया जाए तो क्या ऐसा नाट्य-रूपांतरण मेवाड़ के लोगो की भावनाओं को आहत नहीं करेगा? जिनके ज़ेहन में जौहर की वो आग आज भी जलती हैं और जहाँ आज भी उसकी किवदंतियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि फिल्म में कुछ मसाला तो होता ही है। लेकिन मसाला लगाने से यदि समाज के एक बड़े वर्ग की भावनाएं आहत होती हों, तो उस पर प्रश्नचिंह तो खड़ा होगा ही। यहाँ पर भंसाली जी को फिल्म दि मैसेज  से सीखना चाहिए। बिना मुसलमानों की भावनाएं आहत किए हुए भी यह फिल्म आज भी टॉप-रेटेड है।.यही एक अच्छे निर्देशक की कला है। अन्यथा मसाला लगाकर फिल्म बेचना तो बहुत आसान है।
कितना बुरा लगेगा अगर किसी फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई का ब्रिटिश जनरल ह्ययूज़ के साथ अंतरंग संबंध या चुंबन दिखाया जाए? जो संविधान हमें अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, वही संविधान का अनुच्छेद 19(2) में उसकी सीमाएं भी बांधता है, ताकि किसी की भावनाएं ना आहत हो और देश में शांति बनी रहे। इसी उद्देश्य के लिए फिल्म प्रमाणन-एक्ट बनाया गया। अंत में भारतीय फिल्म निर्माताओं से बस इतनी अपील करना चाहूँगा कि भारतीय लोकतंत्र में आप बिल्कुल स्वतंत्र हैं लेकिन लोकतंत्र, लोक-भावनाएं आहत करके सुरक्षित नहीं रह सकता।