उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया कृषि ऋण माफ़ी योजना ने बैंकिंग और कृषि विशेषज्ञों के बीच एक नयी बहस छेड़ दी है।
स्वतंत्र भारत में यह किसान हितैषी पहली योजना नहीं है। इससे पहले 1989 में जनता पार्टी सरकार ने कृषि ऋण माफ़ी योजना के जरिये ₹10,000 करोड़ के कृषि ऋण माफ़ किये थे, वहीँ 1992 तक इस माफ़ी पर लगभग 6 हज़ार करोड़ की लागत से 4.4 करोड़ किसानों को लाभ पहुंचा था।
2008 में कृषि ऋण माफ़ी एवं ऋण राहत स्कीम के अंतर्गत 3.96 लाख छोटे और सीमान्त किसानों के साथ साथ 59.7 लाख बड़े किसानों को इसका लाभ पहुंचा था इस योजना पर कुल 71,600 करोड़ ₹ की लागत आयी थी।
जबकि प्रदेश स्तर पर हाल ही में तमिलनाडु ने छोटे और सीमान्त किसानों को कृषिगत ऋण से माफ़ी दी थी और उत्तर प्रदेश में हालिया विधसनसभा चुनाव से पूर्व तत्कालीन सरकार ने ₹50,000 करोड़ के वे फसली ऋण माफ़ कर दिए थे जिसे किसानों ने सहकारी बैंकों से क़र्ज़ लिए थे।
2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत में आयी भाजपा नीत गठबंधन सरकार ने सूबे में ₹36,357 करोड़ के कृषि ऋण माफ़ करने का निर्णय लिया जिससे 92 लाख छोटे और सीमान्त किसान, जिन्होंने एक लाख ₹ तक का क़र्ज़ लिया है, उन्हें फौरी राहत मिलेगी जबकि राज्य के राजकोष पर ₹5,360 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला स्वागतयोग्य तो है लेकिन पर्याप्त नहीं, क्योंकि सरकार किसानों को त्वरित राहत पहुंचा कर अपने राजनितिक एजेंडे में लिखे चुनावी वायदे को पूरा कर रही है। इससे किसानो की दशा में कोई नीतिगत और दूरगामी प्रभाव नज़र नहीं आता दिखाई दे रहा है।
आज जरुरत इस बात की है कि किसानों के उनके कृषिगत उत्पादों का तार्किक उचित और समुचित मूल्य मिले। इसमें नकदी और गैर- नकदी फसलों की बाध्यता समाप्त करते हुए राज्य इस दिशा में दृढ़ राजनितिक संकल्प के साथ उदारतापूर्वक कार्य करे।
आज देश के सकल घरेलू उत्पाद में (चालू मूल्य पर) कृषि का 17.5 फीसद योगदान है। देश ने फसल उत्पादन में उत्तोरोत्तर वृद्धि दर्ज की है, वर्तमान ने देश चावल, गेंहू, दलहन, गन्ना, और कपास के उच्च उत्पादक राष्ट्र की श्रेणी में आते है। जबकि दूध उत्पादन में सर्वोच्च और फल-सब्जियों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर काबिज है।
इन उत्साही सफलता के साथ हमारी कुछ कमियां भी सामने आती है, जैसे भारत चावल उत्पादन में तीसरे स्थान रहते हुए भी हमारी कृषिगत उत्पादकता चीन, ब्राज़ील और संयुक्त राज्य अमेरिका के तुलना में अत्यधिक न्यून है। यही स्थिति दलहन की भी है।
इसके इतर और भी समस्याएं हैं। किसानो के छोटे जोत (जहाँ 86 फीसद जोत दो हेक्टेयर से कम है), मानसून पर पूर्ण निर्भरता, सिंचाई के अपर्याप्त संसाधन, मृदा पोषक तत्वों का अनियमित इस्तेमाल परिणाम मृदा की गुणवत्ता और उर्वरा शक्ति का ह्रास, कृषि ऋण में बाधा और बिचौलिया तंत्र का हावी होना, सरकारी तंत्र द्वारा खाद्यान्नों की सीमित खरीदारी, समुचित संख्याओं में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज आदि का न होना और अपूर्ण सप्लाई चेन प्रबंधन व्यवस्था इत्यादि शामिल हैं।
उपरोक्त कमियों के वावजूद अगर सरकार किसानों को सिर्फ ऋण माफ़ी के जरिये सिर्फ त्वरित लाभ पहुंचाती रही तो उन किसान के लिए आने वाला समय और आत्मघाती सिद्ध होगा क्योंकि वे बदलती विश्व व्यवस्था में खुद को खड़े होने के लायक नहीं रह पाएंगे।
हम विश्व व्यापार संगठन और विकसित देशों के दवाब से अछूते नहीं है क्योंकि हमारी कृषि सब्सिडी यथा प्रत्यक्ष (उत्पाद विशिष्ट) और अप्रत्यक्ष (गैर-उत्पाद विशिष्ट) उनके आँखों में खटकती रहती है। इस मुद्दे को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन देशों के साथ हमारी नोक-झोंक आम है लेकिन यह ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला है क्योंकि उनके "पीस क्लॉज़" की भी सीमा है और हमें अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के तहत कुछ समझौते करने पर सकते है। अगर ऐसा हुआ तो यह भारतीय किसानों के लिए अत्यधिक चुनौतीपूर्ण अवस्था होगी। इसलिये हमें आने वाली चुनौती के सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
देश में जब भी किसानों के हित में कोई सकारात्मक कार्य किया जाता है तो कार्पोरेट्स और विदेशी रेटिंग एजेंसियों के भृकुटी तन जाती है और उनके कान खड़े हो जाते है। किसानों का थोड़ा बहुत हित भी इनके आँखों में "कंजक्टीवाइटिस" (आंखों में होने वाला एक रोग) माफिक चुभने लगते है। इस दफे भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इस बार मोर्चा खोला है विदेशी ब्रोकरेज फर्म मेरिल लिंच ने जो 2007-08 की मंदी में अपना हाथ जला चुकी है। इस एजेंसी का मानना है कि अगर इसी तरह किसानों के क़र्ज़ माफ़ी होते रहे तो 2019 में यह आंकड़ा देश के सकल घरेलू उत्पाद के दो फीसद तक पहुँच जायेगा। गौरतलब है कि यह आकलन का आंकड़ा चुनावी वर्ष का है।
इस बार किसानों का हमदर्द समझे जाने वाले भारतीय रिज़र्व बैंक ने किसानों के प्रति हमदर्दी को ताक पर रखते हुए उत्तरप्रदेश के ऋण माफ़ी मसले पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि इससे ऋण कारोबार और वित्तीय अनुशासन को नुकसान पहुंचेगा और उसका असर राज्यों के राजकोषीय स्थिति पर पड़ेगा।
आरबीआई के आंकड़ो पर नजर डाले तो वर्ष 2000-13 के दौरान एक लाख करोड़ रुपए से अधिक के कारपोरेट ऋण माफ़ किये जा चुके है। इसकी तुलना में किसानों को भारतीय स्टेट बैंक ने ट्रैक्टर और फार्म उपकरणों के मद में महज ₹6000 करोड़ की आंशिक माफ़ी दी है। यहाँ एक बात स्पष्ट रूप से जाहिर है कि कृषि और उसके संबद्ध क्षेत्र बैंको की प्राथमिकता सूची में आते है जिन्हें बैंक नजरंदाज नहीं कर सकते हैं पर यहाँ मामला जटिल और पेचीदा है।
बैंको द्वारा किसानों को ऋण देने में की जाने वाली आना कानी से देश भली भांति परिचित है।
भारत में नीतिगत स्तर पर कृषि को विकास का इंजन माना जाता है जिसे सामाजिक अभियांत्रिकी से जोड़ कर देखने की जरुरत है।
किसानी की बुनियादी समस्या पर पूरी संवेदनशील मानवीय रास्ता अख़्तियार करते हुए निराकरण आज की जरुरत है, तभी जा कर सही मायनों में ग्रामीण विकास और गांधी के "सुराज" की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जा सकेगा।
वर्तमान सरकार को चाहिए की वह क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के रेटिंग और अन्य उलझाऊ आंकड़ो में न उलझे और पार्टी लाइन और दलगत राजनीति से ऊपर उठते हुए "प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना" जैसी महत्वपूर्ण पहल के लाभ को अंतिम किसान तक पहुंचाए तब जाकर "कृषि न्याय" (एग्रीकल्चरल जस्टिस) की अवधारणा संपुष्ट हो सकेगी और "सबका साथ, सबका विकास और सबको न्याय" मिल सकेगा।