किसान, एक ऐसा वर्ग जो हमेशा से भारतीय राजनीति और नीति निर्माताओं की आंखों से ओझल ही रहा हैं। समय-समय पर सरकारें बदलती रही हैं, लेकिन अगर कुछ नहीं बदले तो वह है इन किसानों के हालात। सबसे बड़ा वोट बैंक होने के बावजूद भी आज वो हाशिए पर हैं तो इसका कारण है, उसका असंगठित स्वरुप।

हाल ही के दिनों में कई किसान संगठनों ने किसानों की कुछ मांगों को लेकर देश-व्यापी विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की। इसके लिए किसानों ने 1 जून से 10 जून तक अपने माल को जिसमें दूध, फल, सब्जियां जैसी रोजमर्रा की चीज़ों को बाजार तक लाने पर 'स्वघोषित' रोक लगा दी।

किसानों की मुख्य तीन मांगे थी। पहली, उनको अपने उत्पाद का सही या उचित मूल्य मिले, दूसरी, स्वामीनाथन आयोग (2004) की सिफारिशों को अविलंब लागू किया जाए एवं तीसरी मांग ऋणग्रस्त किसानों के ऋण माफ किए जाएं। जब आंदोलन शुरु हुआ तो सरकार और प्रशासन ने इसे बहुत हल्के में लिया। यहाँ तक कि सरकार ने आंदोलन से पूर्व इस आंदोलन को समाप्त करने की कोई ठोस रणनीति तक नहीं बनाई। कहीं न कहीं यही सरकार की सबसे बड़ी चूक रही है। 1 जून से लेकर 3 जून तक आंदोलन में कहीं भी कोई बड़ी घटना नहीं घटी और आंदोलन शांतिपूर्ण चलता रहा। इस आंदोलन का सबसे ज्यादा प्रभाव मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में देखा गया। महाराष्ट्र में चूंकि सरकार ने विधानसभा के चुनावों में कर्ज माफी की घोषणा की थी, इसलिए इस सरकार ने आंदोलन के पहले ही दिन कर्ज माफी मांग को स्वीकार कर लिया, जिसके कारण वहाँ आंदोलन बहुत अधिक सक्रिय नहीं हो सका। वहीं दूसरी और मध्यप्रदेश में सरकार ने 'भारतीय किसान संघ' से वार्ता कर उनकी कुछ मांगे मान ली। इससे संघ ने आंदोलन वापसी की घोषणा कर दी लेकिन 'भारतीय किसान यूनियन' ने आंदोलन वापस लेने से इंकार कर दिया। उनका मानना था कि जब तक सरकार हमारी सभी मांगे नहीं मानेगी, तब तक आंदोलन चलता रहेगा।

मध्यप्रदेश के पश्चिमी जिले जिसमे मुख्यतः इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, नीमच और मंदसौर में इस विरोध की आग और भड़क गई और इस आग में घी डालने का काम किया कुछ राजनीतिक दलों ने। आंदोलन को सफल बनाने के उद्देश्य से किसानों ने उन लोगों का प्रखर विरोध किया, जो छिपते-छिपाते शहर तक फल सब्जी और दूध पहुंचा रहे थे। कई स्थानों पर तो दूध और सब्जियां उनसे छीनकर फेंक भी दी गई। बस इसी स्थिति का लाभ उठाकर कुछ असामाजिक तत्वों ने भी उपद्रव करना शुरू कर दिया। सब जानते है भीड़ का तो कोई चेहरा नहीं होता। इसी भीड़ का हिस्सा बनकर ये अराजक तत्व हिंसा फैलाते रहे और वाहनों को आग के हवाले करते रहे।

मंदसौर एवं उसके आसपास के क्षेत्र पिपलिया मंडी और दलौदा में 6 जून को इस विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया, मौके पर मौजूद पुलिस बल ने इस विरोध को दबाने के क्रम में आंदोलनकारियों पर गोली चला दी और इस गोलीबारी में 6 किसानों की मौत हो गई।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि भीड़ को छाटने के लिए गोली चलाने से पहले पुलिस ने क्या आंसू-गैस और वाटर-कैनन का इस्तेमाल किया था? क्या पुलिस प्रशासन के पास आंदोलनकारियों से निपटने के लिए केवल यही अंतिम विकल्प बचा था? और अगर यही अंतिम विकल्प था तो गोली पैरों पर क्यों नहीं चलाई गई? हम सब जानते हैं, अब जांचों का दौर चलेगा, कुछ अधिकारियों को निलंबित तो कुछ का स्थानांतरण कर दिया जाएगा, लेकिन क्या जिन लोगों की जान चली गई उनके परिजनों के लिए ये सब बातें अब मायने रखती हैं?

राज्य सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के गृह मंत्री ने दो दिनों तक तो ये माना ही नहीं कि किसानों की मौत पुलिस की गोलियों से हुई हैं (हालांकि बाद में उन्होंने स्वीकार कर लिया)। वह तो गनीमत रही कि जिले के कलेक्टर ने मान लिया की गोली पुलिस ने ही चलाई थी।

सरकार ने क्षतिपूर्ति के लिए एक-एक करोड़ की राशि की घोषणा कर दी है। क्षतिपूर्ति की राशि से ये अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। कि सरकार को शायद यह समझ में आ गया कि उसके द्वारा कितना बड़ा अनर्थ हो चुका हैं। उसको आने वालें चुनावों में इसकी कितनी भारी कीमित चुकानी पड़ सकती हैं।

आनन-फानन में शिवराज सरकार ने तुअर, मूंग और प्याज की खरीदी की घोषणा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दी, साथ ही एक ऋण सहायता कोष बनाने की भी घोषणा उन्होंने की हैं।

दरसअल, इस पूरे मामले को किसान बनाम भाजपा के चश्मे से देखने की बजाय हमें किसान बनाम सरकार की तरह से देखना चाहिए, लेकिन चूंकि ज्यादातर राज्यों और केंद्र में भाजपा की सरकार होने से सारा मामला किसान बनाम भाजपा हो गया और यही कारण रहा कि विरोधी राजनीतिक दलों को यहाँ पर अपनी रोटियां सेंकने का पूरा मौका मिल गया।

किसानों की उद्धारक बनने वाली पार्टियां जब भी सत्ता में आती हैं, तो भूल जाती हैं कि जिन अन्नदाताओं ने उन्हें जिताया हैं, उसने बच्चों की पढ़ाई और आजीविका के लिए न्यूनतम आय को सुनिश्चित करें, ताकि वे भी एक गरिमामय जीवन जी सके।

वर्षो से शोषण का शिकार हो रहे किसान आज अगर अपने हक़ के लिए आवाज़ उठा रहा हैं तो लोकतंत्र में इसका स्वागत होना चाहिए, शहर के लोगों को भी इन किसानों के समर्थन में आगे आना चाहिए। ये वही किसान हैं, जिन्होंने केवल 2-3 दिन दूध और सब्जियां शहर नहीं भेजीं तो हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। देश की आधी आबादी को रोजगार देने वाले क्षेत्र की अनदेखी न केवल किसान का, बल्कि राष्ट्र के विकास को भी अवरुद्ध कर देगी।

अब समय आ चुका है कि किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ठोस उपाय किए जाएं। इस संदर्भ में कृषि विशेषज्ञ डॉ. देविंदर शर्मा के सुझाव काफी हद तक उपयोगी हो सकते हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक किसान आमदनी आयोग गठित होना चाहिए, साथ ही अगर ऋण माफ़ी की जा रही है तो सरकार ऐसा तंत्र विकसित करे जिससे किसान पुनः इस दुष्चक्र में न फंसे। वर्तमान सरकार ने किसानों की आमदनी को वर्ष 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में किसानों की आत्महत्या के आंकड़े बहुत ही डरावनी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

उम्मीद है सरकार के कानों तक जब इस आंदोलन की आवाज़ जाएगी तो वह कुछ नीतिगत और जमीनी निर्णय लेकर किसानों को भी देश के विकास का भागीदार बनाएगी और उनकी दशा सुधारने के लिए गंभीर प्रयास करेगी।