“तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण।।”

हिंदी साहित्य के महान कवि गोस्वामी तुलसीदास इस दोहे में समय के ऊपर टिप्पणी करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार से संसार के सबसे बड़े बलवान धनुर्धर अर्जुन भी भीलों का कुछ न कर पाए और समय के आगे बेबस नज़र आए। यह समय का ही फेर है कल तक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित और दिल्ली की गद्दी की मज़बूत दावेदार मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने अस्तित्व की ही लड़ाई लड़ रही है और हाशिये पर जाते हुए नज़र आ रही है। दिंवगत काशीराम द्वारा समाज के पिछड़े, दलितों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खड़े गए आंदोलन ‘बामसेफ’ को बाद में एक राजनीतिक दल (बसपा) का स्वरुप मिला जिसने कई राज्यों में अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराई और उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में कई बार अपनी सरकार भी बनाई। हालांकि कांशीराम के अलावा मायावती, सोनेलाल पटेल आदि कई नेता इस आंदोलन में लगे रहे, लेकिन सरकार बनाने के बाद केवल मायावती जी को ही मुख्यमंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ, कभी गठबंधन में तो कभी अकेले अपने दम पर। ऐसा माना जाता है के काशीराम के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में मायावती ने जगह तो ले ली लेकिन यह भी सुनिश्चित किया के कोई भी उनके कद के आसपास भी न पहुंच सके। और तो और शायद यही कारण है के बसपा में आज मायावती के अलावा द्वितीय पंक्ति तक में कोई अन्य नेता नज़र नहीं आता।

लेकिन बसपा में मायावती का एकमात्र सर्वेसर्वा रहने काफी समय तक उसके लिए लाभदायक भी रहा। यह छवि बनी के बहनजी एक सर्वशक्तिशाली और निर्णायक नेता हैं जिनके अनुशासन और एकाधिकार से वह पार्टी और सरकार चलाने में अपने अन्य प्रतिद्वंदियों के मुकाबले बहुत सक्षम हैं और इसलिए 2007 के विधानसभा चुनाव में उनको भारी बहुमत के साथ चुना गया। हालांकि तब उनकी इस जीत के पीछे उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को भी महत्वपूर्ण माना गया कि किस प्रकार से उन्होंने अपने ‘बहुजन’ के राग को ‘सर्वजन’ में तब्दील कर के सवर्णों को भी अपने खेमे में ले लिया। इसीलिए उन्होंने अपने “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” जैसे उग्र नारों को छोड़ कर “हाथी नहीं गणेश है, ब्रम्हा, विष्णु, महेश है” जैसा सम्मिलित नारों को पकड़ लिया। इससे उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं को भी बल मिला और वह 2009 के लोकसभा चुनाव में अपने आप को 7, लोक कल्याण मार्ग (प्रधानमंत्री निवास) के प्रबल दावेदार के रूप में प्रस्तुत करने लगीं। लेकिन उनको इस चुनाव में अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली और फिर यहाँ से उनके पतन का भी दौर चालू होने लगा। अपनी ही मूर्ति बनवाना, भ्रष्टाचार, घोटाले आदि के आरोपों ने उनको घेर लिया और नतीजन 2012 विधानसभा चुनाव में बसपा को शिकस्त मिली और सपा प्रदेश की गद्दी में काबिज़ हो गई। ऐसे में मायावती नें प्रदेश में रह कर के सपा सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के बजाए राज्यसभा की सदस्यता लेकर दिल्ली से पार्टी चलाने के मार्ग को चुना। इसी वजह से वो प्रदेश में कभी भी विपक्ष के रूप में नज़र ही नहीं आई और उस खाली जगह को भाजपा ने पूरी तरह से अख़्तियार कर लिया। उनके इस रवैये से उनका कैडर भी उनसे दूर होता चला गया और पारंपरिक रूप से उनके वोटर माने जाने वाले दलित भी उनसे छिटक कर भाजपा में चले गए और 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा अपना खाता भी न खोल सकी।

इन परिणामों के बाद भी शायद उनको और उनके रणनीतिकारों को होश नहीं आया और उन्होंने अपने उसी रवैये को जारी रखा। जिस पार्टी का जन्म ही लंबे सामाजिक संघर्ष की लड़ाई लड़ने से हुआ उस पार्टी ने ज़मीनी स्तर पर कोई संघर्ष करना ज़रूरी ही नहीं समझा और इस गफलत में रहने लगी के चूंकि उसका “दलित वोट-बैंक” तो कहीं नहीं जाएगा तो उसे बस समाज के अन्य समुदायों को रिझाना है, और सरकार उसकी! इसीलिए मायवती ने मुसलमानों को रिझाने के लिए 99 मुसलमानों को टिकट दिया। लेकिन दलितों ने अपने आप को “फॉर-ग्रांटेड” लेने से मना कर दिया और भाजपा के हिंदुत्व खेमे में चले गए और मायावती को 2017 चुनाव में केवल 19 सीटों से संतोष करना पड़ा। अपनी गलतियों से सीखने के बजाय जिस तरह से मायावती ने अपनी हार का ठीकरा EVM यानि “इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन” पर फोड़ा है उस से यह साफ़ होता है कि अभी भी वह हार से सीखने को तैयार नहीं हैं। बसपा के संगठन में भी जिस प्रकार से उनके खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं वो कुछ समय पहले सोचना भी अकाल्पनिक था।

जिस तरह से बसपा के कद्दावर नेता और मायावती के करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मायावती के ऊपर भ्रष्टाचार के और उनसे 50 करोड़ मांगने के गंभीर आरोप लगाएं हैं, उससे यह बात तो उजागर हो जाती है कि बसपा में इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। सिद्दीकी ने आरोपों को साबित करने के लिए ऑडियो रिकॉर्डिंग भी प्रस्तुत की है जिसमे लेनदेन की बात की जा रही है। मायावती के ऊपर पैसे लेकर टिकट बेचने के आरोप गाहे-बगाहे लगते रहे हैं। कई नेताओं ने तो यही आरोप लगा कर पार्टी भी छोड़ दी, जिनमें से सबसे ऊपर नाम मौजूदा भाजपा सरकार में मंत्री और एक समय में बसपा के बड़े नेता विपक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य का है। मौर्य ने इसी साल यह कहते हुए पार्टी छोड़ दी थी मायावती ने उनसे टिकट के लिए पैसे मांगे थे। वैसे मायावती के तथाकथित ‘माया'-मोह के ऊपर चर्चा कोई नयी नहीं है। उनके ऊपर पहले से ही आय से अधिक संपत्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। एक बार तो कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने मायावती को ‘दलित’ की नहीं ‘दौलत’ की बेटी होने की बात कही थी। 2010 में लखनऊ में एक सभा में उनको पहनाई हुई हज़ार-हज़ार के नोटों की बड़ी माला ने उस वक़्त भी बहुत सुर्खियां बटोरी थीं। कई लोगों ने ये अनुमान लगाया था कि ये 5-10 करोड़ की माला है। हालांकि तब यही सिद्दीकी साहब ये सफाई देते फिर रहे थे कि स्थानीय कार्यकर्ताओं ने चंदा इकठ्ठा कर के बहनजी को 21 लाख की माला पहनाई है। और तो और वो मायावती के साथ ताज कॉरिडोर मामले में सह-आरोपी भी हैं 2003 में जिसकी FIR सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई द्वारा दर्ज की गई थी।

इन सब के बीच मायावती की अपनी राजनीतिक ज़मीन भी संकट में पड़ गई है। दरअसल, उनकी राज्यसभा सदस्यता अगले साल यानि 2018 में ख़त्म हो रही है। ऐसे में उनका दोबारा राज्यसभा के लिए मनोनीत होना भी बहुत मुश्किल है क्योंकि उसके लिए उनके पास पर्याप्त संख्या में विधायक भी नहीं है। अपनी 19 विधायकों के साथ उनको लगभग इतनी ही और सीटों की आवश्यकता होगी। उनके पास यही सहारा है कि वे सपा, कांग्रेस के साथ हाथ मिला कर अपनी सदस्यता को बरक़रार रखें। लेकिन क्या ये दोनों पार्टी इस बात पर सहमत होंगी? सबसे बड़ा सवाल तो यह है के क्या मायावती अब चेतेंगी और यह समझेंगी की दलित-राजनीती अपने अस्सी और नब्बे के दशक से बहुत आगे निकल चुकी है और दलित युवाओं को सामजिक-न्याय के आलावा आर्थिक प्रगति, विकास, और रोज़गार के मुद्दे भी ज़रूरी लगते हैं। उनको अब समाज के हाशिये में रहना और हर चीज़ के लिए सरकार के सहारे बैठना स्वीकार नहीं है। जब तक बसपा अपने संगठन और नीतियों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं लाती, तब तक यह संभव नहीं है कि वो अपना खोया हुआ मुक़ाम वापस हासिल कर सके। और इसके लिए सबसे पहले मायावती को अपने नज़रिए में परिवर्तन लाना होगा।

(लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में शोधार्थी है)