अपनी बात शुरु करने से पहले ये कहानी पढ़िए...
मैं देश की राजधानी में एक हॉस्टल में रहती हूँ। मेरे साथ और भी मुस्लिम युवतियां रहती हैं। जब पिछले एक साल में जब इस मसले ने तूल पकड़ा तो मेरे साथ रहने वाली एक मुस्लिम लड़की ने एक पर्चा मुझे दिखाया जिस पर त्रिपल तलाक़ पर इस्लामी क़ानून का समर्थन करने की बात की गई थी और इन पर्चों के माध्यम से महिलाओं के हस्ताक्षर लिए जा रहे थे, जिससे यह दिखाया जा सके कि मुस्लिम महिलाओं को इस 'कुप्रथा' से कोई परेशानी नहीं है। दरअसल ये पर्चे मस्जिदों से बंटवायें जा रहे थे। और इतनी चालाकी और आसानी से महिलाओं को फुसलाने की कवायद की जा रही थी, जो शायद ही कभी अधूरी रहे। क्योंकि महिलाओं तक ये पर्चे उनके पतियों द्वारा या प्रेमियों लाये जा रहे थे। ऐसे में ये कतई संभव नहीं कि महिलाएं अपने पुरुषों की इच्छा के विरुद्ध उन पर हस्ताक्षर न करें। जब मेरे पास ये पर्चा एक (महिला द्वारा) आया तो मैंने न सिर्फ मना किया बल्कि लाने वाली (अविवाहित) महिला से ही पूछ लिया कि क्या वह चाहेगी कि एक दिन उसका पति एक झटके में उससे तलाक़, तलाक़, तलाक़ कह दे और वह कुछ भी न कर पाए? उसने इतना सुनते ही पर्चा फाड़ दिया। इसका आशय है कि महिलाएं त्रिपल तलाक़ से छुटकारा तो पाना चाहती हैं लेकिन अपने समुदाय के पुरुषों के सामने ऐसा करने की हिम्मत नहीं होती।
धर्म से इतर दरअसल, ये मसले सिर्फ और सिर्फ पुरुषवादी वर्चस्व को बनाए रखने के माध्यम हैं। इनके पीछे कभी धर्म का सहारा लिया जाता हो तो कभी किसी और चीज का। बात चाहे 'त्रिपल' तलाक़ की हो, इस्लाम में पुरुषों के बहुविवाह की हो या संपत्ति में महिलाओं को बराबर का हिस्सा देने की... इन सब में पुरुष अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है।
शिक्षा के नाम पर महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे बस इंटरमीडिएट या अधिक से अधिक ग्रेजुएशन तक जा सकती हैं। इसके बाद यह छूट कतई नहीं दी जाती कि वे किसी पेशे को अपनाकर स्वयं 'आर्थिक स्वायत्ता' हासिल कर सकें। क्योंकि अगर महिलाएं संपन्न होंगी तो वे पुरुषों से स्वतंत्र हो जाएंगी और यही हमारा समाज (चाहे वह किसी भी धर्म की बात हो) नहीं चाहता।
पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करने का विरोध करने वाले तर्क देते हैं कि बुराई त्रिपल तलाक़ में नहीं है बल्कि इसके वर्तमान स्वरुप में है। कुछ हद तक उनका यह तर्क स्वीकार्य हो सकता है। इस्लाम में शादी जन्म-जन्मांतर का बंधन नहीं है, यह दो लोगों के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट है, जहाँ अपनी मर्जी से इसे तोड़ा जा सकता है। पुरुष ऐसा तलाक़ के माध्यम से करते हैं। यहाँ दोनों को बराबर अधिकार नहीं हैं। पुरुष तलाक़ 'दे' सकते हैं जबकि महिलाएं तलाक़ 'मांग' सकती हैं, जिसे 'खुला' कहते हैं। अगर पति ऐसा करने से मना करता है तो फिर वह क़ाज़ी के पास जाएगी। मतलब, महिलाओं की इच्छा अपने पति या क़ाज़ी पर ही निर्भर करती है। यहाँ महिलाओं को बराबर का हक़ न दिये जाने के पीछे जो पुरुषवादी सोच है, उसे देखिए। इसके पीछे कारण दिया जाता है कि महिलाएं 'अस्थिर स्वभाव' (जल्द गुस्सा करने वालीं) की होती हैं और किसी छोटी सी बात से नाराज़ होकर तलाक़ का दुरुपयोग कर सकती हैं, इसीलिए उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया।
तीन तलाक़ में हर तलाक़ के बाद 3 महीने का अंतर होना चाहिए और इस अवधि में पति-पत्नी के बीच किसी प्रकार का संबंध भी नहीं बनना चाहिए। इसके पीछे मान्यता है कि इन तीन-तीन महीनों (कुल छः माह) में पति को अपने निर्णय पर फिर से सोच-विचार करने का मौका मिल जाता है। लेकिन वर्तमान हाल देखें तो हम पाते हैं कि कहीं किसी ने फोन पर गुस्से में तीन बार तलाक़ बोल दिया तो कहीं एक झटके में लोग व्हाट्सअप पर तीन बार तलाक़ लिखकर महिलाओं को अकेला और बेबस छोड़ देते हैं। अगर इस बुराई को मौलवी या मौलाना दूर करने की ईमानदार कोशिश नहीं करेंगे तो फिर एक महिला के पास न्यायालय का दरवाजा खटखटाने या उनकी समस्या सुनने का दावा करने वाली किसी पार्टी (भाजपा) के पास जाने का रास्ता ही बचता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं ऐसी कई महिलाओं को जानती हूँ जो एक महिला होने के नाते मुझसे अपनी पीड़ा बांटती (शेयर) हैं लेकिन वे सार्वजनिक रुप से किसी गैर-महिला को यह नहीं बताएंगी। यही कारण है कि जो इस बार के चुनावों में इन महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया है।
यह बात ठीक है कि त्रिपल तलाक़ से हर महिला पीड़ित नहीं होती लेकिन क्या हिंदुओं में कुछ दशक पहले तक चलने वाली सती प्रथा हो या शिशु वली की कुरीति की... इनसे भी हर स्त्री या बच्चा प्रभावित नहीं था लेकिन फिर भी आम महिलाओं में इनके प्रति गुस्सा था। ठीक ऐसे ही त्रिपल तलाक़ के मसले पर है। आंकड़ों की बात करें तो मुस्लिम समाज में शिक्षा-साक्षरता की स्थिति अन्य समुदायों की अपेक्षा अच्छी नहीं है, उसमें महिलाओं की स्थिति तो और भी बुरी है। ऐसे में यह मानना थोड़ा मुश्किल लगता है कि शिक्षा के अभाव में मुस्लिम महिलाओं की सोच अपने परिवार के पुरुषों या धर्म-प्रमुखों (मौलवी-मौलाना) की सोच से अलग कैसे हो सकती है। लेकिन इसके सबसे बावजूद ये एक तथ्य है कि बिना शिक्षा के भी मुस्लिम महिलाएं त्रिपल तलाक़ के मसले पर अपने आप को डर के साये में पाती हैं और यही वजह है कि वे हर उस व्यक्ति या राजनीतिक दल का समर्थन करने के लिए तैयार रहती हैं जो इस मसले पर उन्हें राहत देने का वादा करता है।
बात सिर्फ त्रिपल तलाक़ तक ही सीमित नहीं है। आखिर क्यों महिलाओं को परिवार की संपत्ति में बराबर का हिस्सा नहीं दिया जाता। हिंदू-परिवारों में जहाँ कानूनी रुप से बराबर संपत्ति का अधिकार बेटियों को है लेकिन (भले वास्तविकता में अभी ये दूर की कौड़ी दिखाई देता है) इस्लामी (पर्सनल) कानूनों में तो लड़की परिवार की संपत्ति में नाम मात्र की (न के बराबर) अधिकारी होती है।
एक परिवार में यदि किसी बच्चे के साथ भेदभाव होता है तो पहले तो उसे अपने माता-पिता से उम्मीद करनी चाहिए कि घर का मामला घर में ही निपट जाए लेकिन अगर घर के लोग इसे नहीं सुलझाते तो फिर न्यायालय जाने या तीसरे किसी पक्ष के पास जाने का विकल्प ही बचता है।
अब अगर विस्तृत रुप से देखा जाए तो चाहे त्रिपल तलाक़ का मसला हो, बहुविवाह का मसला हो, संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी हो या कुछ और... हमें ऐसे क़ानून की जरुरत है जो सब पर एक समान लागू हो। दूसरे शब्दों में इसका एक हल यूनीफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) है। धर्म के नाम पर महिलाओं को दबाने या कमतर आंकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
पहले तो कोई भी पार्टी इस मसले को उठाना ही उचित नहीं समझती, इसका निराकरण तो दूर की बात है। समाजवादी और बसपा जैसे दल तो मुस्लिम समाज को खुश करने के लिए महिला विरोधी हो जाते हैं। इसके उलट कांग्रेस ने तो शाहबानो के रुप में आए सुधार के एक मौके को गंवा दिया। ये दल कभी नहीं चाहेंगे कि मौलवी-मौलाना नाराज़ हो जाए। अब जब भारतीय जनता पार्टी ने इसके समाधान का आश्वासन दिया है तो निश्चित ही महिलाओं ने उनको वोट दिया है।
(लेखिका भारत के एक बड़े मीडिया संस्थान में टीवी पत्रकार हैं)