शनिवार, 18 मार्च 2017. यह वो तारीख़ है जिसकी शाम से, देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का मुखिया कौन होगा, ये तय हो गया। एक तरफ योगी का नाम फाइनल हुआ तो दूसरी तरफ प्रतिक्रियायों का दौर चल पड़ा और भविष्य में किसको, खासकर भाजपा को कितना फायदा होगा, कितना नुकसान, भारत कैसा होगा, इसकी राजनीति कैसी होगी... इसकी बहस भी होने लगी।
लेकिन सही मायनों में देखा जाए तो अभी यह कहना मुश्किल है कि आखिर क्या होगा। यह सब इस बात पर निर्भर है कि भाजपा इस बहुमत का प्रयोग कैसे करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो कैसे इस अवसर को भुनाती है। भाजपा के लोग कहते हैं कि 2014 का जनादेश सिर्फ विकास के लिए नहीं था, बल्कि वह 'हिंदुत्व' के लिए भी था। यही धारणा उनकी इस बार भी हो सकती है। अगर भाजपा के लोग ऐसा सोचते हैं तो हम उन्हें गलत नहीं ठहरा सकते क्योंकि अंततः उन्होंने न सिर्फ चुनाव जीता है, बल्कि प्रचंड बहुमत से जीता है। अगर उन्होंने 2014 का चुनाव हिंदुत्व के मसले पर जीता है तो उत्तर प्रदेश के चुनाव में उन्होंने इस बात को दोहराते हुए पुष्ट भी किया है। इसके बाद हम ये कहने की स्थिति में नहीं है कि योगी का चयन भाजपा के लिए कितना नुकसानदेह होगा।
फिर ये कहना कि अगर हिंदुत्व के मसले पर ही भाजपा को चुनाव लड़ना था तो विधानसभा चुनाव में योगी को पहले ही चेहरा घोषित चाहिए था, भी वजनदार तर्क नहीं है। उनकी यह रणनीति हो सकती है। भाजपा ने बिना चेहरे के चुनाव लड़ा, (संभवतः) विकास और हिंदुत्व दोनों को लेकर चुनाव लड़ा। अगर वो पहले चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ते तो संभव है कि कोई एक मसला हल्का पड़ जाता। उनकी ये रणनीति सफल भी रही है इसलिए कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
अब बारी आती है विपक्ष की... खासकर बैचारिक विपक्ष, जिसकी उपस्थिति संसद या विधानसभा में न होकर 'कहीं और' है। अपने आप को सेक्युलर/लिबरल कहने वालों के कारण ही भाजपा इस स्थिति में पहुंची है। ये लोग एक व्यक्ति की पिछले 15 सालों से एक-तरफा आलोचना करने में लगे हैं। लेकिन हुआ क्या? मोदी के विजय रथ को दो बार हार (दिल्ली और बिहार) का भी सामना करना पड़ा लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि मोदी की भाजपा इनकी आलोचना के कारण हारी है। लेकिन ये पक्का है कि जो चुनाव मोदी जीत रहे हैं, उनमें इस वर्ग की आलोचना प्रमुख है। ये लोग जितना बोलेंगे, उतना इनका 'दोहरा' चरित्र उजागर होगा, यही भाजपा के लिए फायदेमंद है। इस वर्ग के लिए सबसे पहले अटल जी कट्टर थे। जब तक आडवाणी जी का युग आया तो वाजपेयी जी उदार लगने लगे, मोदी जी का युग आया तो आडवाणी जी उदार लगने लगे अब योगी की शुरुआत हुई तो लोग मोदी को 'ठीक' कह रहे हैं लेकिन योगी को कट्टर... तो ये क्रम है जो चलता रहेगा।
आज जो लोग योगी को कट्टर कह रहे हैं, वही लोग बीएमसी चुनाव में शिवसेना को भाजपा से दो सीटें ज्यादा मिलने पर खुशी मना रहे थे! शिवसेना की जीत कब से 'सेक्युलर' हो गई?
इतिहास से कोई अपना पीछा नहीं छुड़ा पाएगा। जो इतिहास योगी का, वह हमेशा रहेगा। लेकिन उनके पुराने भाषणों को बार-बार दोहराने से अब कुछ नहीं होने वाला। उन्हें बहुमत मिल चुका है। अब आलोचकों को भविष्य की ओर देखना और इंतज़ार करना चाहिए। उन्हें अब जो नई जिम्मेदारी मिली है, उसे कैसे निभाते हैं, ये देखिए। इतिहास के आधार पर किसी के प्रति पूर्वाग्रह बनाना ठीक नहीं, चाहें योगी हों या ओबैसी हों या कोई और...
जो लोग योगी के चयन में हिदुत्व को प्रमुखता दे रहे हैं, उनका एक तर्क यह भी है कि मोदी-शाह की पहली पसंद योगी नहीं थे, बल्कि ये संघ द्वारा लाए गए हैं। लेकिन याद रखिए उत्तर प्रदेश की जीत का श्रेय अगर सबसे ज्यादा किसी एक व्यक्ति को दिया जाए तो वह भाजपा आध्यक्ष अमित शाह को जाता है। वही टीम के कप्तान थे, ऐसे में यह कहना कि आदित्यनाथ योगी अमित शाह और मोदी की पहली पसंद न होकर संघ की पसंद हैं, ठीक नहीं। बल्कि मैं तो कहूंगा कि योगी ही भाजपा नेतृत्व की पहली पसंद थे।
योगी के चयन में लोग हिंदुत्व को प्रमुखता से देने वाला बता रहे हैं लेकिन मेरा मानना इससे उलट है। केंद्र में बैठे प्रधानमंत्री विकास के बीसियों कार्यक्रम चला रहे हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री पूरी क्षमता से लागू करवाना चाहते हैं। ऐसे में अगर कोई ढीला-ढाला मुख्यमंत्री हो तो शायद चीजों को न संभाल पाए तो इस स्थिति से निपटने के लिए योगी से बेहतर चेहरा भाजपा के पास नहीं है। प्रधानमंत्री की योजनाओं को कड़ाई से लागू कराने के लिए उन्हें कठोर प्रशासक की जरुरत थी। दूसरे शब्दों में विकास को केंद्र में रखते हुए ही योगी का चुनाव किया गया है।
जो लोग इस समय उत्तर प्रदेश भाजपा में हैं, उनमें से कोई ऐसा नहीं जो शासन-प्रशासन को कड़ाई से चला पाता... योगी ही एकमात्र ऐसा चेहरा हैं, जिनमें ये क्षमता है। जो छवि कल्याण सिंह (कठोर प्रशासक) की थी, योगी के अलावा वह छवि किसी नेता की नहीं है। जो स्थिति इस समय उत्तर प्रदेश की है, उसमें कानून-व्यवस्था एक बहुत बड़ा मुद्दा है। इस फ्रंट पर अगर योगी कुछ अच्छा कर ले जाते हैं तो ये प्लस प्वॉइंट बनेगा।
राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश अगले दो साल बहुत महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं। इन दो सालों में नरेंद्र मोदी को ऐसा कुछ करना है जो उन्हें फिर सत्ता दिलवा दे। जब वह फिर से वोट मांगेंगे तो विकास ही एक ऐसा मसला है जो सबसे आगे रहेगा। चूंकि उत्तर प्रदेश में इस सबके साथ कानून व्यवस्था भी एक अहम मसला है तो इसे देखते हुए ही योगी का चुनाव किया गया है।