हर जगह साजिश देखने की आदत से बाज आया जाए, तब भी समाजवादी पार्टी की अंदरूनी कलह को लेकर संदेहों का निवारण नहीं होता। झगड़े का कितना असली था और कितना सियासी मकसद साधने के लिए बढ़ाया गया, इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है। अखिलेश और शिवपाल यादव गुटों में जारी तनातनी के बीच उप्र के मुख्यमंत्री के संचार अभियान सलाहकार स्टीव जार्डिंग का एक ई-मेल लीक हुआ। उसमें अखिलेश यादव को पिता से लड़ते दिखने की सलाह दी गई थी। हालांकि बाद में जार्डिंग ने उस कथित ई-मेल को फर्जी बताया था, लेकिन यह निर्विवाद है कि जार्डिंग छवि सुधारने के लिए अखिलेश यादव को परामर्श देते हैं।
जार्डिंग अमेरिका में हारवर्ड विश्विद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे वहां डेमोक्रेटिक पार्टी की संचार अभियान टीम से जुड़े रहे हैं। यानी राजनीतिक तौर पर छवि निर्माण का लंबा अनुभव वे रखते हैं। खबरों के मुताबिक गुजरे महीनों में अखिलेश यादव ने अपनी जन-कल्याण योजनाओं पर अमल और उसके प्रचार की रणनीति जार्डिंग के सुझावों के मुताबिक ही बनाई। इस पृष्ठभूमि में यह असंभव नहीं है कि सपा की अपराधी-सांप्रदायिक राजनीति की छवि का बोझ हटाने के लिए भी अखिलेश ने जार्डिंग की सलाह ली हो।
फिलहाल यह भले अटकल हो, मगर इस बात की मीडिया में खूब चर्चा है कि सपा की कलह का अखिलेश को लाभ मिला है। इससे वे अपनी स्वच्छ एवं विकास-पुरुष की छवि बनाने में सफल रहे हैं। मुमकिन है कि यह इमेज इस चुनाव में जीत दिलाने लायक साबित ना हो। लेकिन लंबी अवधि में इसका फायदा उन्हें मिलेगा, यह अनुमान जरूरत जताया गया है। ये बातें मौजूदा विधानसभा चुनाव के सिलसिले में भी इसलिए अहम हैं, क्योंकि इस झगड़े के पहले तक सपा मैदान से बाहर दिख रही थी। ये धारणा मजबूत हो रही थी कि बहुजन समाज पार्टी अगले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी होगी।
मगर अब नई छवि और संभवतः (कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल के साथ) नए गठबंधन के साथ अखिलेश यादव भी एक प्रमुख दावेदार बनेंगे, ये धारणा बनी है। अब विश्लेषण का मुद्दा यह है कि यह नया घटनाक्रम भाजपा के फायदे में होगा, अथवा इसका उसको नुकसान होगा?
पिछले लोकसभा चुनाव में अपने गठबंधऩ सहयोगी अपना दल के साथ मिलकर भाजपा ने उप्र की 80 में से 73 सीटें जीती थीं। तकरीबन 43 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। विधानसभा की सवा तौन सौ से भी ज्यादा सीटों पर उसने बढ़त बनाई थी। इसी मजबूत समर्थन आधार को देखते हुए यह कहा गया है कि इस चुनाव में एकमात्र आश्चर्यजनक परिणाम भाजपा का हारना ही हो सकता है। 2014 की तुलना में 10 से 12 प्रतिशत वोट गवां कर भी वह जीतने की स्थिति में होगी। इसलिए कि उसके विरोधी दलों में तब किसी अन्य के लिए 30 प्रतिशत वोट तक पहुंचना कठिन होगा। इसीलिए माना गया था कि अगर सपा मैदान से बाहर दिखे, तो भाजपा विरोधी वोटों की पूरी गोलबंदी बसपा के पक्ष में होगी और उस हाल में उसकी जीत की संभावनाएं उज्ज्वल होंगी। मगर सपा मजबूत विकल्प के रूप में दिखती रही, तो गणित भाजपा के पक्ष में झुका दिखेगा।
बहरहाल एक पहलू ऐसा जरूर है, जो इस संभावना को विफल कर सकता है। वह है नोटबंदी। तमाम भाजपा विरोधी दलों की उम्मीदें इसके हुए असर पर टिकी हैं। यह निर्विवाद है कि नोटबंदी अपने घोषित लक्ष्यों को पाने में नाकाम रही। इसकी वजह से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कम आय वर्ग के लोग तबाह होते दिखते हैं। कृषि आधारित तबकों का भी वही हाल है। नोटबंदी के कारण देश ऐसी आर्थिक बदहाली की तरफ जा रहा है, जहां से संभलने में दशकों लग सकते हैं। मगर इसका कोई राजनीतिक परिणाम हो रहा है, इसके फिलहाल संकेत नहीं हैं। कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी फिलहाल इसके सियासी नतीजों को संभालने में सफल हैं।
इसके पीछे गरीब तबकों में नोटबंदी के कारण भविष्य में अच्छे दिन आने की जगी उम्मीदों की बड़ी भूमिका है। साथ ही एक तरह का वर्ग द्वेष भी फैला है। हालांकि यह सच नहीं है, लेकिन व्यापक तौर पर यह धारणा फैली है कि नोटबंदी से असली नुकसान चोरी-छिपे अपना धन रखने वाले धनी लोगों को हुआ। उत्तर प्रदेश भी ऐसी धारणाओं का अपवाद नहीं है। अब देखने की बात होगी कि गैर-भाजपा दल आम वोटरों के मन में बैठी ऐसी बातों को निकालने में कितना सफल होते हैं? अथवा, भाजपा “अच्छे दिन” और भविष्य में “तोहफे” मिलने की उम्मीदें जगाए रखने में कितना कामयाब रहती है? यह संभवतः उप्र विधानसभा चुनाव का निर्णायक पहलू सिद्ध होगा।
चूंकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर हमारे सामने नहीं हैं और अखिलेश यादव की पार्टी या गठबंधन की सूरत साफ नहीं है, इसलिए विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर किया गया कोई आकलन यथार्थवादी नहीं होगा। अभी सिर्फ यही कहा जा सकता है कि भाजपा मनोवैज्ञानिक बढ़त के साथ मैदान में उतर रही है, बसपा ने प्रभावशाली समीकरण तैयार किया है और गति उसके पक्ष में है, जबकि सपा को लेकर स्थितियां भ्रामक हैं।
मगर विडंबना यह है कि इन चुनावों में सबसे कम दांव सपा का लगा है। वह हार जाती है, तब उसे सत्ता-विरोधी भावनाओं का स्वाभाविक परिणाम माना जाएगा। चूंकि नई छवि के साथ अखिलेश का नेतृत्व लगभग स्थापित हो गया है, अतः भविष्य में उनके नेतृत्व वाली पार्टी एक ताकतवर विकल्प बनी रहेगी। मगर यही बात बसपा के साथ नहीं है। उसके लिए ये करो या मरो का चुनाव है। इसमें हार हुई तो मायावती की सियासी हैसियत में गहरी सेंध लग जाएगी। तब उन्हें एक क्षयशील प्रभाव वाली नेता के रूप में देखा जाएगा। भाजपा के लिए यह 2014 की अपनी ताकत के साथ-साथ 2019 में दिल्ली के तख़्त पर वापसी से जुड़ी संभावनाओं की रक्षा की लड़ाई है। इन तीन बड़ी ताकतों के अलावा कांग्रेस भी मैदान में होगी। उसका दांव ज्यादा बड़ा नहीं है। मगर उसकी उम्मीद यह जरूर है कि भले वह कम सीटें जीते, मगर हालात ऐसे बनें जिसमें सत्ता की चाबी उसके हाथ में आ जाए। यह नहीं हो तो कम-से-कम वह उठती हुई शक्ति के रूप में दिखे। इन बिंदुओँ पर निराशा उसकी राष्ट्रीय संभावनाओं पर एक प्रहार होगा।