ब्रजकिशोर शर्मा

हम इतिहास देखें। ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय ने इतिहास नहीं देखा है। जब कोई इतिहास नहीं देखता तो वह इतिहास दोहराता है और उसकी गलतियां भी।

अनुच्छेद 143 में यह व्यवस्था है कि सार्वजनिक मसले पर राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय सलाह या प्रतिवेदन मांग सकता है। इसी शक्ति के तहत 1993 में राष्ट्रपति महोदय ने अयोध्या मसले पर उच्चतम न्यायालय से एक (परामर्श) प्रतिवेदन मांगा था, इसमें दो चीजें थीं। एक, वहाँ पर भूमि अधिग्रहण करके मंदिर की मांग करने वाले लोगों को देना चाहते तो यह पूछा गया कि क्या ऐसा करना संभव है? दूसरा, यह पूछा गया कि क्या वहाँ कभी मंदिर था? न्यायालय ने प्रतिवेदन देने से मना कर दिया।

उत्तर न देने का कोई कारण नहीं था, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने नहीं दिया।

जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी तो उन्होंने छः महीने में इस मसले को सुलझा देने का आश्वासन दिया। इसके जवाब में विश्व हिंदू परिषद वाले हर माह उनेक आवास के बाहर शंख, घंटी-घड़ियाल, बिगुल से ध्वनि करते और याद दिलाते कि अब एक महीना हो गया, दो महीने हो गए... तीन हो गए। लेकिन छः महीने यूं ही बीत गए।

चंद्रशेखर की सरकार आई, उनका कार्यकाल ही छोटा था, लेकिन उन्होंने आते ही कहा कि एक महीने में इस मसले को हल कर देंगे। इसके लिए उन्होंने सब पक्षों से बातचीत करने का फैसला किया। बातचीत की इस प्रक्रिया में लेखक के एक मित्र भी थे, जिनके अनुसार बातचीत मे कभी गाजर के हलुए की तारीफ होती तो कभी किसी और व्यंजन की... और फिर अगली बैठक की तारीख़ और स्थान निर्धारित करके बैठकें ख़त्म हो जाती थीं। जैनमुनि सुशील कुमार जी ने कहा कि वो मध्यस्थ्ता करेंगे लेकिन कुछ नहीं हुआ। श्रंगेरी मठ के स्वामी जी ने बिना किसी को बताए बातचीत की पहल की, जब कांग्रेस को इसकी भनक लगी तो उन्होंने भी इसमें अपना एक नुमाइंदा भेजा... लेकिन कुछ परिणाम नहीं निकला।

न्यायालय ने पहली बार इस तरह की गलती की हो, ऐसा नहीं है। जब जिला न्यायालय में ये विवाद आया तो विशुद्ध रुप सिविल वाद था। सिविल विवाद भूमि पर स्वामित्य से संबंधित होता है जिसमें मसला था कि भूमि मंदिर की है या मस्जिद की। शुरुआत में जो लोग शामिल थे, उनमें सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड नहीं था। क्योंकि फैज़ाबाद लखनऊ के नवाबों की राजधानी थी और जो शिया थे। वहाँ जो मस्जिद थी उसमें 1934 से कोई नवाज़ नहीं हुई न ही मुस्लिम समुदाय के लोग उसमें जाते थे।

आरंभ में शिया समुदाय से जुड़े स्थानीय लोग (मुस्लिम) वादी थे, लेकिन उच्चतम न्यायालय को देखिए कि इस विवाद में उसने हैदराबाद के मुसलमानों को भी शामिल करते हुए कहा कि इन्हें भी सुना जाए, फिर सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को भी शामिल कर लिया गया। फैजाबाद के मसले पर हैदराबाद या मुरादाबाद के मुस्लिम क्यों मुद्दई बना दिए गए? इस तरह उच्चतम न्यायालय ने चीजों को जटिल बना दिया है।

फिर लंबी जदोजहद के बाद इलाहाबाद का फैसला आया, जिसमें तीन न्यायाधीशों की पीठ में एक मुस्लिम भी थे। कानून का कोई भी छात्र इस फैसले को पढ़ और आसानी से समझ सकता है कि गलती हुई कहाँ है।

इन तीनों ने एक ही निर्णय लिखा है कि वहाँ पहले से मंदिर था। मंदिर के प्रमाण न सिर्फ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कराए गए उत्खनन पर आधारित हैं बल्कि अन्य संस्थाओं ने भी मंदिर होने की पुष्टि की है। लेकिन गड़बड़ी हुई 'अनुतोष' में, यह विधि की भाषा का शब्द है जिसे अंग्रेजी में रिलीव देना कहते हैं। ये सिविल प्रक्रिया के विरुद्ध है, यह विधि के विरुद्ध है। इसको एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए एक घर को लेकर तीन व्यक्ति क, ख, और ग दावा करते हैं। न्यायालय में सुनवाई होती और न्यायालय यह मान लेता है कि घर 'क' और 'ख' का है लेकिन चलो 'ग' को भी एक छोटा सा कमरा या चबूतरा दे देते हैं। यहीं गलती हुई।

इसी को लेकर मामला उच्चतम न्यायालय पहुँचा था। निर्णय देने के स्थान पर न्यायालय अपने कर्तव्य से विमुख हो रहा है। जबकि दूसरा पक्ष भी यही चाहता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से उसे इस बात का पता चला चुका है कि जमीन किसकी है, ऐसे में दूसरे पक्ष का एक मात्र उद्देश्य है कि इसी तरह मामला अधर में रहे और मंदिर निर्माण न हो सके।

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं उच्चतम न्यायालय के पास इतना कार्यबल नहीं है कि तीन सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ बना कर त्वरित न्यायालय (फास्ट ट्रैक) की तरह प्रतिदिन के हिसाब से सुनवाई कर सके तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जनहित के नाम पर न्यायालय जब सड़कों की मरम्मत करवा सकता है, स्ट्रीट लाइटों के मसले सुन सकता है तो उसके पास इतना कार्यबल नहीं कि दशकों के लंबित मामले पर फैसला दे सके?

अंत में, जैसे हरि अनंत, हरि कथा अंनताः है, ठीक उसी तरह बातचीत भी अनंत है। इससे कोई हल नहीं निकलेगा।

{लेखक ब्रजकिशोर शर्मा, प्रख्यात संविधानविद हैं। विधि मंत्रालय, भारत सरकार में अपर सचिव और प्रतिलिप्याधिकार (कॉपीराइट) बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं। विधि विषयों पर एक दर्जन से अधिक किताबों के लेखक हैं}