सबसे जरुरी बात, सबसे पहले, मैने यह लेख साल 2003 में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव शुरू होने के ठीक पहले लिखा था। कांग्रेस मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर खुली चुनौती दी थी कि वे इस बार भी सारी बाधाओं को पार कर चुनाव जीतेंगे, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने 5 साल पहले चुनाव जीतकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था।

लेकिन इससे पहले कि आप यह लेख पढ़ना शुरू करें, आप मतपत्र (बैलेट पेपर) और ईवीएम में एक मूल अंतर समझ लीजिए जो इस सबको समझने के लिए जरुरी है। मतपत्र के माध्यम से हो रहे चुनाव में मतदाता को एक मतपत्र में अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम के आगे एक निशान लगाने तथा उस मतपत्र को एक बक्से (मतपत्र पेटी) में डालने को कहा जाता है। नियमतः मतदाता द्वारा केवल एक ही उम्मीदवार का चयन किया जा सकता है और मतपत्र में एक से अधिक निशान अथवा पूरे मतपत्र में कहीं भी कोई भी दूसरा निशान नहीं होना चाहिए।

यदि किसी मतपत्र में कहीं भी कोई भी दूसरा निशान अथवा एक से अधिक निशान पाए जाते हैं, तो उस वोट को अमान्य घोषित कर दिया जाता है तथा गिनती की प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में वह वोट किस उम्मीदवार को मिलेगा अथवा पूर्णतया निरस्त होगा, यह निर्णय करने का अधिकार पूरी तरह रिटर्निंग अधिकारी के हाथों में होता है। भारत में रिटर्निंग अधिकारी सामान्यतः उसी जिले के डीएम होते हैं और चुनाव के ठीक पहले सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे इलाकों में, जहाँ चुनावी मुकाबला बेहद नजदीकी होने की उम्मीद होती है, अपने 'अनुकूल' डीएम नियुक्त करना बहुत ही आम बात है।

वोटों की गिनती के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के एजेंट, इन मतपत्रों पर बारीक नज़र रखते थे और मतपत्र पर कहीं भी, हल्के से भी हल्का दूसरा निशान मिलने पर मत को 'अवैध' घोषित करवाने पर आमादा हो जाते थे। ऐसे में 'अनुकूल' डीएम निर्णायक अधिकारी होने के कारण सत्तारूढ़ पार्टी के संदेहास्पद वोटों को मान्य कर देता था तथा विपक्षी पार्टियों के संदेहास्पद वोटों को खारिज कर देता था। अदालतों में भी 'रिटर्निंग अधिकारी' का निर्णय ही अंतिम माना जाता था। सामान्य शब्दों में कहें तो ऐसे चुनाव, जहाँ कोई राजनीतिक पार्टी एक बड़े अंतर से जीत रही हो, वहाँ इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ता था लेकिन ऐसे चुनाव, जहाँ मुकाबला बेहद नजदीकी हो, वहाँ यह जीने मरने का प्रश्न बन जाता था। और यह कहने की भी जरूरत नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी अपने इस प्रभाव का दुरुपयोग करती थीं। यद्यपि चुनाव आयोग को नियमतः ऐसे पक्षपातपूर्ण अधिकारियों का तबादला करने का अधिकार था, लेकिन यह उस समय अधिक प्रचलन में नहीं था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह सत्तारूढ़ पार्टियों द्वारा चलाया जा रहा एक अभिशाप था, जो बूथ कैप्चरिंग की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल, व्यवस्थित एवं चरणवद्ध था।

ईवीएम के आने के बाद मतपत्र की इन दो खामियों से छुटकारा मिला। पहली यह कि ईवीएम में कोई वोट अवैध नहीं होता है। आप बटन दबाइये और आपका वोट दर्ज। दो बार बटन दबाने का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरी यह कि ईवीएम के आने से महाकुख्यात 'बूथ कैप्चरिंग' बंद हो गई, जिसका सीधा सा कारण यह है कि ईवीएम में हर वोट चुनाव अधिकारी के निश्चित समय पर जारी आदेश के बाद ही डाला जा सकता है। मतपत्रों का पूरा डब्बा छीनकर, उसपर अपने हिसाब से निशान लगाकर वापस डब्बे में डाल देने की सहूलियत, उस समय का सबसे सुविधाजनक प्रचलन थी।

दूसरी ओर ऐसे मतदान केंद्र, जहाँ पर विरोधी पार्टियों के बहुत ज्यादा समर्थक होने की उम्मीद होती थी, वहाँ पर रणनीति के तहत सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बैठाये गए अधिकारी, मतपत्र पेटी में स्याही फेंक देते थे, और इस प्रकार जब गिनती शुरू होती थी तो अधिकांश वोट अमान्य घोषित कर दिए जाते थे। ध्यान रहे, इन वोटों को मान्य अथवा अमान्य करने का अंतिम अधिकार रिटर्निंग अधिकारी को ही होता था।

इसके अतिरिक्त, अवैध वोट चुनाव नियंत्रित करने का एक यंत्र बन गए थे और इस प्रकार अवैध मत विवादों का एक मुख्य बिंदु बन चुके थे। यह बात आप इस उदाहरण से और स्पष्तः समझ सकते है। 1998 में हुए मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी ने सदन की 320 सीटों में से 172 सीटों का साधारण बहुमत हासिल किया। इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा जीतीं गयीं लगभग 35 सीटों पर जीत का अंतर, अवैध किये गए कुल मतों से कम था। अब ईवीएम के प्रयोग से इस प्रकार के विवाद की संभावना समाप्त हो गयी है।

अगर आप सत्तारूढ़ पार्टियों और शक्तिशाली प्रत्याशियों द्वारा बार-बार चुनाव जीतने के लिए अपनाए जाने वाले इन व्यवस्थित बेइमानियों आंकलन करने बैठें, तो पीएचडी के अनगिनत शोध-ग्रंथ (थीसिस) लिखे जा सकते हैं। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि सन् 1998 तक 90% से ज्यादा चुनाव परिणाम सत्ता पक्ष के अनुकूल आते थे, जबकि ईवीएम के आगमन के ठीक बाद 90% से ज्यादा चुनाव परिणाम सत्तापक्ष के प्रतिकूल आये।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए, मैंने सन् 1998 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों का अध्ययन किया।

1998 में, सभी आंकलन-मूल्यांकन, मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का अनुमान लगा रहे थे लेकिन बाजी कांग्रेस मार ले गयी। उस समय मध्यप्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था और जब सभी 320 सीटों पर चुनाव परिणाम घोषित किये गए तो कांग्रेस के हाथ 175 सीटें लगीं जबकि भाजपा 118 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। बहुजन समाज पार्टी ने 11 सीटें जीतीं। कई बड़े नेता, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विक्रम वर्मा शामिल थे, दिग्विजय सिंह की आश्चर्यजनक जीत की आंधी में बह गए। महत्वपूर्ण बात ये है कि कांग्रेस मुख्यमंत्री ने यह पहले ही कह दिया था कि चुनाव 'मैनेजमेंट' के कारण जीते जाते हैं। उन्होंने इतनी बड़ी एन्टी इंकंबेंसी तोड़कर एक चमत्कार सा कर दिया और सब आकलनों को गलत साबित कर दिया। लेकिन यह कोई चमत्कार नहीं था।


कुछ ही महीने पहले, फरवरी 1998 के लोकसभा चुनाव में 220 सीटों पर आगे रहने के बाद भाजपा के कई पारंपरिक गढ़, कांग्रेस के आगे ढेर हो गए। भाजपा छत्तीसगढ़ में केवल 45% सीटें (जहाँ भाजपा को क्षेत्र की सभी 90 सीटें जीतने की उम्मीद थी), मध्यभारत में 35% तथा महाकौशल क्षेत्र में 43% सीटें ही जीत सकी। केवल ग्वालियर और विंध्यांचल क्षेत्र में ही भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से अच्छा रहा।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 90 में से 46 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी 33 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बाहर कांग्रेस ने 230 में से 124 सीटें जीतीं जबकि बीजेपी के हिस्से आईं 103 सीटें। पूरे राज्य में केवल पुराना भोपाल ही एक ऐसा क्षेत्र था, जहाँ भाजपा को बेहतर परिणाम मिले। राजधानी और इसके आसपास की 12 सीटों में बीजेपी को 8 सीटें प्राप्त हुईं। कांग्रेस को 4 सीटें मिलीं जिनमें उत्तरी भोपाल और दक्षिणी भोपाल की दो प्रतिष्ठावान सीटें उसे कड़ी टक्कर के बाद मिलीं। क्षेत्र के अनुसार देखने पर पता चलता है कि कांग्रेस ने मध्यभारत क्षेत्र की कुल 99 सीटों में से 58 सीटें अपने नाम कीं जबकि बीजेपी को 33, बहुजन समाज पार्टी को 6 तथा अन्य को 2 सीटें मिलीं। महाकौशल क्षेत्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने 76 में से 45 सीटों पर कब्ज़ा किया। बसपा यहाँ अपना खाता भी नहीं खोल सकी। विंध्य क्षेत्र की 43 सीटों में से 17 कांग्रेस के पाले में गयीं, जबकि 15 बीजेपी के।

भाजपा और कांग्रेस के बीच मात्र 1% का वोट अंतर रहा (39% व 40% क्रमशः), लेकिन इस एक प्रतिशत ने ही कांग्रेस के लिए जीत की दिशा तय कर दी। जिस एन्टी इंकंबेंसी फैक्टर को भाजपा बहुत अधिक महत्व दे रही थी, वह राज्य में ज्यादा असर नहीं दिखा पाया। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि कांग्रेस ने नकारात्मक छवि वाले तत्कालीन विधायकों को भी टिकट नहीं दिया, जबकि भाजपा ने कई तत्कालीन विधायकों को टिकट दिए और यह भी कांग्रेस की जीत का बड़ा कारण रहा।

1998 मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव विवरण:-


अवैध वोटों की कुल संख्या- 4,60,000 (लगभग 2%)

कुल सीटें- 320 (1,500 अवैध वोट प्रति सीट)

जबकि इस चुनाव में लगभग 4,000 वोट 'मिसिंग' पाए गए।

दिग्विजय के 'चमत्कार' में 'अवैध वोटों' की भूमिका:-

मालूम हो कि 1998 में भारत में चुनाव मतपत्र के माध्यम से ही होते थे। चुनाव आयोग ने ईवीएम का प्रयोग शुरू नहीं किया था। इस प्रकार जो चीज़ इस चुनाव की जीत में कांग्रेस के सबसे ज्यादा काम आई, वो थे 'अवैध वोट'। दिग्विजय सिंह येन-केन प्रकारेण वो सभी 35 सीटें जीतने में कामयाब रहे, जहाँ जीत का अंतर अवैध वोटों से कम था।

उदाहरण के लिए केसकाल क्षेत्र की बात करते हैं। यहाँ कांग्रेस मात्र 343 वोटों से चुनाव जीती, जबकि अंतिम गणना और 'सेटलमेंट' के बाद अवैध मतों की संख्या इस से कहीं ज्यादा 2,561 थी। गौरतलब है कि अंतिम गिनती के एक चरण पहले यह संख्या लगभग 3,000 थी। इस प्रकार यह साफ साफ समझा जा सकता है कि कैसे अंतिम गणना ने चुनाव परिणाम कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में पलट दिया। ठीक इसी तरह की घटना 'धार' में भी हुई।

एक अन्य उदाहरण कोंटा विधानसभा क्षेत्र का है। यहाँ कांग्रेस मात्र 748 वोटों से चुनाव जीत गयी जबकि अवैध मतों की कुल संख्या 2,906 थी। 'पुनर्गणना' की यह प्रक्रिया उन सभी 35 विधानसभा सीटों में सम्पन्न हुई, जहाँ पर अवैध वोटों ने विजयी प्रत्याशी का निर्धारण किया। सामान्यतः अंतिम गिनती तक अवैध मतों की संख्या कम हो जाती है। लेकिन इस चुनाव में आखिरी गिनती के एक चरण पहले तक यह संख्या काफी ज्यादा होती थी, जो यह दर्शाता है कि किस तरह से अंतिम चरण की पुनर्गणना ने चुनाव परिणाम कुछ निश्चित प्रत्याशियों के पक्ष में मोड़ दिया।

मध्यप्रदेश के चुनावों में अवैध मतों की संख्या हमेशा से ही ज्यादा रही है। यदि हम इस तरह के वोटों का विश्लेषण करें, तो हमें पता चलता है कि नब्बे के दशक में हुए सातों चुनावों में (3 विधानसभा और 4 लोकसभा), 1998 के विधानसभा चुनाव में अवैध मतों की संख्या सबसे कम थी।

यह दर्शाता है कि 1998 के विधानसभा चुनावों में 'अवैध' मतों का ऐसा अच्छा 'प्रबंधन' किया गया, जो मध्यप्रदेश के चुनाव इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। इससे भी ज्यादा आकर्षित करने वाली बात यह है, कि ये सभी सीटें काफी दूर-दूर बिखरी हुई थीं और इनका कोई ऐसा 'विशिष्ट भौगोलिक झुंड' नहीं बनाया जा सकता था, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर कंप्यूटर डाटा विश्लेषण में कोई भटकाव दिखाया जा सके। इसलिए हारे हुए प्रत्याशी 'वैध वोटों की वैधता' पर, या यूँ कहें कि 'वैध वोटों की अवैधता' पर कोई सम्मलित आपत्ति दर्ज नहीं करा सके।

दिग्विजय सिंह ने सही कहा था। उन्हें चुनावों को 'मैनेज' करने की कला अच्छे से आती थी। वो एक, दो या तीन नहीं, पूरी 35 सीटों को 'मैनेज' करने में सफल रहे, और इसका मीठा फल उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनकर मिला।

अब आप यह विचार कीजिये कि यदि 1998 के विधानसभा चुनाव में 'अवैध वोटों' का यह खेल ना हुआ होता, तो परिणाम क्या होते। जाहिर है, प्रतिपक्षी पार्टी बहुमत में होती और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद, प्रतिपक्ष की मध्यप्रदेश में बढ़त और बढ़ जाती।


2003 के बदलाव:-

चुनाव आयोग ने यह आदेश दिया, कि राज्य के अगले विधानसभा चुनाव में सभी 41,000 मतदान केंद्रों पर ईवीएम का प्रयोग किया जाएगा। इस प्रकार 'अवैध' वोटों का विकल्प हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

और केवल यही नहीं, मतदाताओं को मतदन केन्द्र पर अपने साथ, चुनाव आयोग द्वारा मान्य कोई एक फोटो पहचान पत्र लाना अनिवार्य कर दिया गया। फ़ोटो पहचान पत्र के आभाव में व्यक्ति को वोट देने से वंचित करने का आदेश दिया गया और इसके लिए चुनाव आयोग को अदालत की अनुमति भी मिली। इस व्यवस्था ने 'फर्जी संवर्धित वोटर लिस्ट' का विकल्प समाप्त कर दिया, क्योंकि लिस्ट में दर्ज व्यक्ति को साथ में 'मान्य' फ़ोटो पहचान पत्र लाना पड़ता था।

यह बात उल्लेखनीय है कि 2003 में ईवीएम के प्रयोग के साथ ही अवैध वोटों की संख्या घटकर शून्य पर आ पहुंची। इसका परिणाम यह हुआ कि नजदीकी टक्कर वाली सीटों पर हेरफेर की गुंजाइश खत्म हो गयी। अब दिग्विजय सिंह जी के पास चुनाव 'मैनेज' करने का कोई विकल्प नहीं बचा था और यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं है कि उन सभी सीटों पर, जहाँ अवैध वोटों के हेरफेर के कारण सवाल उठे थे, कांग्रेस की करारी हार हुई।

इनवैलिड सिंड्रोम' : लोकसभा में भी कारगर:-

अवैध वोटों ने 1998 के लोकसभा चुनावों में भी '69' संसदीय क्षेत्रों में अपना प्रभाव दिखाया। हम चाहे किसी को भी दोष दें- मतदाताओं की अशिक्षा अथवा भोलेपन को, सामान्य विद्वेष को, या फिर आधिकारिक प्रबंधन को, लेकिन अवैध मत एक ऐसा कारक थे, जिसे सभी 69 संसदीय क्षेत्रों में बारीकी से समझना जरूरी था, जहाँ इन्होंने जीत के अंतर को भी पीछे छोड़ दिया।

इस संदेहास्पद प्रणाली का सबसे सटीक प्रतिनिधित्व करता उदाहरण है बिहार का राजमहल संसदीय क्षेत्र, जहाँ भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी बोम मरांडी ने अपने नजदीकी कांग्रस प्रतिद्वंदी को मात्र 9 वोटों से हराया, जबकि डाले गए 'अवैध' मतों की कुल संख्या 10,432 थी। इसी प्रकार, अवैध मतों के एक और सुस्पष्ट भुक्तभोगी हैं पूर्व उपप्रधानमंत्री और हरियाणा लोकदल उम्मीदवार देवीलाल, जिन्हें उनके नजदीकी कांग्रेस प्रत्याशी ने 303 वोटों से हराया। इस संसदीय क्षेत्र में कुल 8,225 अवैध वोट पड़े।

एक और उल्लेखनीय उदाहरण तमिलनाडु के तिरुपत्तूर संसदीय क्षेत्र का है, जहाँ द्रमुक प्रत्याशी मात्र 274 वोटों के अंतर से जीतने में सफल रहा। यहाँ डाले गए कुल अवैध वोटों की संख्या 25,250 थी।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि इन अवैध मतों पर ठीक-ठीक फैसला लिया गया होता, तो इन सभी संसदीय क्षेत्रों में परिणाम कुछ और भी हो सकते थे। वे 69 संसदीय क्षेत्र, जहाँ अवैध मतों ने चुनाव परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उनमें से उत्तरप्रदेश में 11, महाराष्ट्र में 8, तमिलनाडु में 7, गुजरात और आंध्रप्रदेश में 6-6, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान में क्रमश 5-5-5, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में 3-3, असम, हरयाणा और केरल में क्रमशः 2-2-2 तथा गोवा, मिजोरम, पंजाब, अंडमान और निकोबार में क्रमशः 1-1-1-1 संसदीय क्षेत्र आते थे।

अवैध वोटों का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा और कांग्रेस को हुआ। भाजपा जहाँ 69 में से 21 सीटों पर अपने प्रत्याशी जिताने में सफल रही, वहीं कांग्रेस के 20 उम्मीदवारों के हाथ विजयश्री लगी। गौरतलब है कि इस प्रक्रिया का सबसे ज्यादा नुकसान भी भाजपा और कांग्रेस को ही हुआ। अवैध वोटों के कारण 69 में से कांग्रेस के 24 जबकि बीजेपी के 18 उम्मीदवार चुनाव हारे।

उदाहरणस्वरूप, अंडमान और निकोबार में भाजपा को कांग्रेस के हाथों 544 वोटों से शिकस्त झेलनी पड़ी, जबकि अवैध वोटों की कुल संख्या 1,850 थी। हालांकि भाजपा के एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार, मुख्तार अब्बास नक़वी ने रामपुर में अपने कांग्रेस प्रतिद्वंदी को 4,936 वोटों से हराया, जबकि अवैध वोटों की कुल संख्या 9,510 थी। कांग्रेस की एक प्रमुख हार तब भी हुई जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस उम्मीदवार मोहन देव, असम की सिलचर सीट पर अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंदी से 19,566 वोटों से चुनाव हार गए जबकि कुल घोषित अवैध वोटों की संख्या 25,957 थी।

इसी प्रकार भाजपा के वजनदार उम्मीदवार विनय कटियार को फैजाबाद सीट से समाजवादी पार्टी उम्मीदवार मित्रसेन यादव के हाथों 7,737 वोटों से हारकर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। यहाँ अवैध वोटों की संख्या लगभग 11,000 थी।

कभी पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव का संसदीय क्षेत्र रह चुके नंदयाल में तेलगु देशम पार्टी के उम्मीदवार भूमा नागी रेड्डी ने कांग्रेस उम्मीदवार को 4,650 वोटों से पराजित किया जबकि कुल अवैध वोटों की संख्या 10,287 थी।

भारतीय चुनाव प्रक्रिया में पिछले 50 सालों में जितने भी बदलाव आए हैं, ईवीएम का प्रयोग उनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। ईवीएम के प्रयोग का सबसे बड़ा उद्देश्य मतपत्र के निर्माण और छपाई में आने वाले खर्चे, तथा मतपत्रों की गिनती में लगने वाले अत्यधिक समय को कम करना था।

इसके अतिरिक्त, ईवीएम के प्रयोग का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि इसके प्रयोग से अवैध मतों की संख्या घटकर शून्य पर पहुंच गई है क्योंकि इसमें मतदाता की पसंद केवल एक बार दर्ज की जाती है। जबकि मतपत्र में कई बार बहुत से मतदाता, दो उम्मीदवारों के बीच की विभाजक रेखा पर निशान लगा देते है, जिससे सही पसंद का विवेचन करना मुश्किल हो जाता है और इससे गणना के समय हेराफेरी की संभावना बढ़ जाती है।

इसके अलावा, अवैध मत चुनाव 'मैनेज' करने का एक यंत्र और विवादों का एक प्रमुख बिंदु बन गए हैं। लोग 1998 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से उदाहरणस्वरूप सीख ले सकते हैं, जहाँ सत्तारूढ़ पार्टी ने उन 35 सीटों की कृपा से बहुमत प्राप्त किया, जहाँ पर जीत का अंतर अवैध वोटों से कम था। अब ईवीएम के आ जाने से ऐसी किसी विवादित स्थिति की संभावना ही समाप्त हो गयी है। ग्रामीण क्षेत्रों में बूथ कैप्चरिंग की समस्या भी लगभग समाप्त हो गयी है क्योंकि ईवीएम को कैप्चर नहीं किया जा सकता। और यदि कैप्चरिंग हो भी जाती है, तो बड़े पैमाने पर फर्जी वोट डालना मुश्किल है, क्योंकि ईवीएम में एक समय में रिटर्निंग अफसर द्वारा एक ही वोट निर्गत किया जा सकता है। जबकि परंपरागत मतपत्र प्रणाली में मतपत्रों के पूरे गट्ठर पर कब्ज़ा करना, उन पर अपने हिसाब से निशान लगाना तथा मतपत्रों को वापस बक्सों में डालना बहुत आसान था।

अब ताजा ताजा विवाद यह है कि ईवीएम से छेड़छाड़ किस प्रकार की जा सकती है। हाल ही में विपक्षी पार्टियों ने भाजपा पर यह आरोप लगाया है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, ईवीएम में छेड़छाड़ कर के जीत है। यहाँ हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि इन पार्टियों ने विगत 24 महीनों में कई राज्य चुनाव, इन्हीं ईवीएम के प्रयोग से जीते हैं। अब लाख टके का सवाल है कि क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है या उस से छेड़छाड़ की जा सकती है? स्पष्ट उत्तर है- नहीं। ना केवल मशीन में, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग द्वारा संचालित पूरी चुनाव प्रक्रिया में इतनी जांच एवं नियंत्रण व्यवस्थाएं होती हैं कि नियोजित तरीके से ईवीएम को हैक करना बिल्कुल असंभव है। हो सकता है कि इस पूरी प्रक्रिया को समझाने के लिए मैं निकट भविष्य में अलग से एक लेख लिखूं। लेकिन अभी आप बस ये स्वयंसिद्ध नियम याद रखिये- जो लोग सत्ता में है वो सत्ता में बने रहने के लिए सिस्टम का दुरूपयोग करने की कोशिश करते हैं। और जब कोई भी सिस्टम 90% से ज्यादा सत्ताविरोधी परिणाम दे, तो इस बात का एक ही मतलब है कि सत्तापक्ष सिस्टम का गलत उपयोग नहीं कर पाया। जैसे वे लोग मतपत्र का गलत उपयोग करते थे और 90% से ज्यादा चुनाव परिणाम सत्तापक्ष में आते थे। इस बारे में मनन कीजिये, और आपको 'अवैध' मतों से 'वैध' उत्तर मिल जाएगा।

(लेखक जानेमाने चुनाव विश्लेषक और चुनाव सर्वेक्षण कराने वाली संस्था 'सीवोटर' के प्रमुख हैं)

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