समाजवादी पार्टी पर कब्जे की लड़ाई में युद्ध के स्थापित सिद्धांत भी टूटते नर अा रहे हैं। अाम तौर पर युद्ध में दोनों अोर के सेनापति ही एक-दूसरे के घोर विरोधी होते हैं। लेकिन समाजवादी कलह में दोनों पालों के नायकों में कोई तकरार नहीं बल्कि दोनों अोर से निशाने पर रखने के लिए खलनायक जरूर चिह्नित कर लिए गए हैं। खास बात यह कि दोनों खेमों की हल्ला-बिग्रेड ने ये खलनायक नहीं तय किए हैं बल्कि दोनों अोर के नायकों ने इन्हें खलनायक के तमगे से नवाज़ा है।

गए कई दिनों से चल रही इस लड़ाई में एक तरफ के नायक मुलायम सिंह यादव तो दूसरे खेमे के नायक अखिलेश यादव हैं। नायकों में कोई रार नहीं। बल्कि वास्तविकता में इसका उल्टा है। अखिलेश कई बार कह चुके हैं कि "नेताजी से कोई शिकवा नहीं। वे बस तीन महीना दे दें, हम चुनाव जीत कर सब उन्हें समर्पित कर देंगे"

अखिलेश अौर उनके खेमे ने विरोधी पाले के नायक यानी मुलायम सिंह यादव को तो भरपूर इज्ज़त बख़्शी है लेकिन खलनायक के तौर पर अमर सिंह को चिह्नित किया है। जिन्हें अखिलेश यादव कई बार ‘बाहरी ठहरा चुके हैं। यह बात दीगर है कि इस ‘बाहरी’ अौर ‘खलनायक’ को अपने से जुदा करने का कोई संकेत मुलायम सिंह यादव, यानि पाले के नायक ने नहीं दिखाया है।

मुलायम खेमे पर गौर करें तो उस अोर भी दूसरे पाले के नायक यानी अखिलेश यादव के प्रति कोई खटास नहीं। चुनाव अायोग में साइकिल पर दावा ठोकने के दस्तावेज़ देकर निकलने के बाद मुलायम सिंह यादव बोले "अखिलेश मेरा पुत्र है अौर हम पिता-पुत्र मेें कोई विवाद नहीं" अलबत्ता उन्होंने यह जरूर जोड़ा कि एक व्यक्ति विवाद पैदा कर रहा है। ‘एक व्यक्ति’ यानी प्रो. रामगोपाल यादव, जिन्हें मुलायम खेमा विरोधी पाले का खलनायक बता रहा है।

ठीक वैसे ही जैसे अखिलेश यादव का खेमा अमर सिंह को खलनायक ठहरा रहा। खास बात यह कि जैसे मुलायम सिंह उनके पाले के खलनायक अमर सिंह को अलग नहीं कर रहे वैसे ही अखिलेश भी उनकी अोर के खलनायक बताए जा रहे रामगोपाल से दूरी बनाने की कई चाहत नहीं दिखा रहे।

दरअसल दोनों अोर से विरोधी पाले के नायकों के प्रति हमदर्दी के भाव रखने अौर दुश्मनी निभाने के लिए एक-एक खलनायक चिह्नित करना महज़ संयोग नहीं। यह दोनों अोर के नायकों की सियासी मजबूरी अौर रणनीति का हिस्सा भी है, ताकि समाजवादी पार्टी का वोट अाधार ख़फा न हो अौर दोनों में एक को चुनते समय उनके ही पाले में बड़ी संख्या में अाए।

मसलन अखिलेश जानते हैं कि दूसरे पाले के नायक यानी मुलायम सिंह यादव को निशाने पर लिया तो सपा का मूल वोट अाधार इसे नापसंद कर सकता है। ऐसे में अपना राजनीतिक नुकसान। लिहाज़ा निशाना अमर सिंह। ठीक इसी तरह मुलायम भी जानते हैं कि अखिलेश को निशाने पर रखा तो उनके प्रति हमदर्दी बढ़ेगी।

वैसे भी साढ़े चार साल तक उन्हें बतौर मुख्यमंत्री काम न करने देने की तोहमत मुलायम पर ही लगती रही है। अब चुनावी संग्राम में भी अखिलेश के खिलाफ वही तेवर रखकर मुलायम उनके प्रति समर्थन का पलड़ा झुकने नहीं देना चाहते। वे रामगोपाल को निशाने पर लेते हुए पुत्र के प्रति भरपूर प्रेम का इज़हार कर रहे हैं। समाजवादी संग्राम में दोनों अोर के इस दांव-पेच से साफ है कि पालों के नायक गलबहियां का संदेश देते हुए खलनायकों को निशाने पर लेते हुए शह-मात का खेल खेलेंगे।