पहले दिन हुई जबर्दस्त बारिश ने हमें खरगोन जिले में सिर्फ जलुद तक सीमित कर दिया था। जलुद से हम शाम होते-होते निकले। आगे का कोई संपर्क, कोई ठिकाना नहीं था तो दिन डूबने से पहले विश्राम-स्थल की आस थी। तो हम नए जिले और नए स्थान की ओर बढ़े। नए स्थान धरमपुरी में रुकने का कोई प्रबंध नहीं मिला तो 10 किमी वापस आकर खलघाट में रात गुजारी। यानि 20 किमी की 'फालतू' की यात्रा! पाँच-छह दिनों यात्रा में एक एकमात्र विश्राम था जिसके लिए 'भुगतान' करना पड़ा। शेष रातें सफर करते हुए गुजरीं या किसी के यहाँ मेहमाननवाज़ी करते हुए।



खलघाट, छोटा सा क़स्बा। या कहें कि एक बड़ा सा चौराहा। रात का खाना दो प्लेट 'पोहा'! सुबह का नाश्ता भी पोहा! पहले दिन का बहुत सा समय बारिश के कारण बर्बाद हो गया था। दरअसल, प्रकृति हमें हमारी औकात बताती रहती है लेकिन हम मानने को तैयार नहीं होते। तो अगली सुबह सबसे पहले एक छतरी खरीदी और निकल गया नर्मदा घाट पर। खलघाट का बहुत ज्यादा इलाक़ा डूब प्रभावित नहीं है। यहाँ याद करने लायक कभी कोई विरोध-प्रदर्शन भी नहीं हुआ है। तो करीब 45-50 मिनट का समय बिता कर हम अगले पड़ाव की ओर निकले।

धरमपुरी, जिला धार, मध्य प्रदेश, डूब प्रभावित एकमात्र क़स्बा, इंदौर से दूरी एक-सौ किलोमीटर


जैसा इसके नाम से कुछ आभास मिलता है, धर्म के असंख्य निशान यहाँ दिखाई देते हैं। यहाँ हमारी मुलाक़ात अधिवक़्ता दीदार खान और भरत कुमार महाजन से हुई। दोनों लोग डूब प्रभावित हैं, दोनों लोग न्यायालयों के माध्यम से लड़ रहे हैं और दोनों ही एक समय नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े रहे हैं। यहाँ भी मूल समस्या वही है। पुनर्वास कहाँ हो, कैसे हो, क्या रहेगा, क्या जाएगा... का प्रश्न है।

दीदार खान और भरत कुमार के अनुसार धरमपुरी में डूब प्रभावित लोगों के लिए जिस ज़मीन का चयन किया गया है, वह ज़मीन भी जलस्तर बढ़ने से रहने योग्य नहीं रहेगी। दरअसल, यह जमीन नर्मदा और उसकी सहायक नदी, खुज नदी के बीच में एक पट्टी के रूप में हैं। जिस पर एक समय अच्छी खेती होती थी और यह पूरी तरह घिरी हुई है। करीब 14 साल पहले इस भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जिसमें बमुश्किल 20-25 लोगों ने अपने मकान बनावाए हैं। जिस ज़मीन का अधिग्रहण किया गया है, वह डूब प्रभावित क्षेत्र की सीमा से सटी है।

इसके बीच मुख्य सड़क सीमा रेखा है, फिर यह नई ज़मीन दूसरी तरफ से भी सहायक नदी से घिरी है, जिससे जल स्तर बढ़ने पर बैक-वाटर (जरूर) आएगा। भरत कुमार कहते हैं कि जब यह बात लोगों ने प्रशासन के सामने रखी तो अधिकारी ऑफ-द-रिकॉर्ड इस बात को मानते हैं कि आज नहीं तो कल यह भूमि भी रिहायशी उपयोग के लिए ठीक नहीं रहेगी।



दोनों लोग बांध के हानि-लाभ गिनवाते हुए कहते हैं कि प्रश्न व्यवस्था का है। बांध से लाभ जिसको होगा, उसको होगा। राष्ट्रनिर्माण में किसी ना किसी को तो कीमत चुकानी ही पड़ती है लेकिन सबसे पहले उन लोगों को राहत मिलनी चाहिए जो इससे प्रभावित हो रहे हैं, हम भी तो इसी राष्ट्र का हिस्सा हैं। तीस सालों से लंबित इस मामले में लोगों ने अपने घरों का निर्माण रोक रखा है कि पता नहीं कब कौन सा फरमान आ जाए।

फिर कभी प्रशासन कहता है कि हमने बैक-वाटर की व्यवस्था कर ली है, जिससे कम घर डूबेंगे। तो ना तो आपके अनुमान ठीक हैं, ना नीतियों का निर्माण ठीक हो रहा है और ना ही उनका क्रियान्वयन... ऐसे में कैसे लोगों को विश्वास हो। आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट कर दूं कि दोनों लोगों की ज़मीन का पुनर्वास स्थल के लिए अधिग्रहण किया गया है। इस हिसाब से यहाँ निजी-हित लग सकते हैं लेकिन निजी हित किसी भूगोल को नहीं बदलते। नई भूमि तीन ओर से नर्मदा और इसकी सहायक नदी से घिरी है।


समस्या इस इतनी नहीं है। यहाँ हमें एक नई समस्या से रू-ब-रू हुए। 29 जुलाई को मध्यप्रदेश सरकार ने सरदार सरोवर बांध के बढ़ते हुए जलस्तर से प्रभावित 7010 परिवारों को 5 लाख 80 हज़ार का पैकेज देने की घोषणा की। नर्मदा बचाओ आंदोलन इस संख्या को 40 हज़ार बताता है। इस घोषणा का यहाँ की डूब प्रभावित बस्ती में बड़ा सा बैनर भी लटक रहा था। तो अब इन झुग्गीनुमा घरों में रहने वाले लोगों की समस्या यह कि प्रशासन इसी 5 लाख 80 हज़ार में 2 लाख 50 हज़ार प्रधानमंत्री आवास योजना के 'एडजस्ट' कर रहा है। मतलब डूब प्रभावित पैकेज में से सिर्फ 3 लाख 30 हज़ार ही इफेक्टिव हुए।

लोगों का कहना है कि नई ज़मीन पर शून्य से शुरुआत करने के लिए यह रकम पहले से ही कम है, क्योंकि जिस ज़मीन पर प्लॉट दिए गए हैं, वहाँ एक बड़ा हिस्सा भराई में ही चला जाएगा। इनकी मांग है कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ अलग से दिया जाए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा में कहीं नहीं दिखता कि इसमें प्रधानमंत्री आवास योजना को भी 'एडजस्ट' किया जाएगा। रोजगार और जीविका का प्रश्न ना हो, ऐसा नहीं हो सकता। सिर्फ किसान ही इससे प्रभावित हो रहे हैं, ऐसा भी नहीं है।



धरमपुरी में यह मछुआरों की बस्ती है। विक्रम वर्मा को यह नहीं पता कि यहाँ से सरदार सरोवर बांध की दूरी कितनी है लेकिन वे इससे, इसके प्रभाव से अच्छी तरह परिचित हैं। उन्हें अपने रोजगार की चिंता है। कहते हैं कि बहते हुए पानी में अपेक्षाकृत अधिक मछलियां मिलती हैं, जब पानी ठहरेगा तो मछलियां कम होंगी, दलदल बनेगा।

इतिहास की जल समाधि!

माना जाता है कि पांडव अज्ञातवास में यहीं रुके थे। तभी से महाराज धर्मराज युधिष्ठिर के नाम पर इसका नाम धरमपुरी पड़ा। कहते हैं यहीं महर्षि दधीचि ने अस्थि-बज्र का महादान किया था। खैर... जिस जगह यह दान किया गया था, वह स्थान नर्मदा के बीचों-बीच एक टापू पर है, इसे 'बेंट' के नाम से जाना जाता है। बढ़ते हुए जल के साथ जिसकी कटान इसकी कटान हो हो रही है। हमारे सामने ही हमने मिट्टी और पेड़-पौधों को गिरते देखा।


इसके अलावा यहाँ के लोगों को उस शोध के बारे में भी जानकारी है जिसमें दावा किया गया है कि मनुष्य का सबसे पहला और पुराना अस्तित्व इसी घाटी में मिला है। जो भी हो लेकिन इतना तय है कि बढ़ते हुए जल स्तर के साथ इतिहास जल-समाधि ले रहा है। हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कुछ प्रयास किए हैं लेकिन फिर भी जो मैंने आंखों से देखा, उससे इंकार नहीं कर सकता।


दिन के बारह बजने को हैं। नाश्ते में लिए गए पोहे अपना काम कर चुके हैं। खाने का समय हो चुका है और बस पकड़ने का भी, अगले पड़ाव पर निकलना है। देखते हैं, खाना पहले मिलता है या बस... तो बस मिल गई। दोपहर का भोजन... अब नहीं मिलेगा। तो इस तरह सफ़र शुरु हुआ है उस गाँव के लिए जिसका "सफ़र खत्म" हो रहा है। मिलते हैं अगली कड़ी में, एक ब्रेक के बाद!