--जयप्रकाश नारायण

इस दशक में राजनीति अपने आपमें एक जटिल पहेली बन गई है। कुछ चीजें तो स्पष्ट हैं। लोग राजनीति से अपने आप को दूर करते जा रहे हैं। विचारधारा को छोड़कर, दलों में व्यक्ति-पूजा बढ़ रही है। चुने हुए जन-प्रतिनिधियों की ख़रीद-फ़रोख़्त, दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी, एक-दूसरे के प्रति अनुशासन घट रहा है। अवसरवादी गठबंधन बन रहे हैं। सरकारें अपने आप में लड़खड़ा रही हैं। ये सब बुराइयां अभी जारी रहेगीं।

ये स्थिति हम सबके लिए एक चुनौती है... और अवसर भी!

अगर हम सभी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और आशा करें कि कोई चमत्कार हो जाएगा, कोई महान नेता या तानाशाह जन्म लेगा और सब चीजों को दुरुस्त कर देगा... तो आप विश्वास मानिए, पूरे आदर और सम्मान के साथ ये बात कह रहा हूँ कि एक नागरिक के तौर पर आप ठंडे पड़ चुके हैं, आप बेकार हो चुके हैं।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर क्या किया जाना चाहिए? जवाब स्पष्ट है।

एक नागरिक के तौर पर हमें अपने कर्तव्य पहचानने होंगे और उनका पालन करना होगा। राजनीतिक दल, विधायक/सांसद और मंत्री अपने आप को सर्वोच्च (बेलगाम) समझने लगे हैं। लोग क्या सोचते-विचारते हैं, इससे उन्हें कतई कोई फर्क नहीं पड़ता... और फर्क पड़े भी क्यों... जब जनता ने भी सोचना-विचारना ही छोड़ दिया है! उन्हें (जन-प्रतिनिधियों को) इस बात कि कोई चिंता नहीं है कि उनका मतदाता क्या चाहता है? क्योंकि उसमें (मतदाता में) जागरूकता और संगठन की कमी है।

राजनीतिक दल अपना प्रोपागैंडा चलाते हैं। और ये सब इसलिए नहीं होता कि आम जनता विभाजनकारी सोच से ऊपर उठ सकें, जनता के बीच एक स्वस्थ बहस हो सके, अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक में अंतर किया जा सके। लेकिन ऐसा होना चाहिए और इस प्रकार का जनमत निर्माण करना हम सबकी जिम्मेदारी और पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए।

दुर्भाग्यवश विद्वान भी इस मामले में अपने खोल में सिमट कर रह गए हैं। कुछ छात्र और शिक्षक भी दलगत राजनीति में जा चुके हैं और मुझे पता है, वे इसी में रहेंगे भी... लेकिन ध्यान रखिए, इससे हम दलगत भावना से ऊपर उठकर ऐसे जनमत का निर्माण नहीं कर पाएंगे, जो सब दलों पर भारी पड़े। हमें राजनीतिक दलों की सोच और आमजन की सोच में अंतर करना पड़ेगा और दूसरों को इस अंतर के बारे में समझाना पड़ेगा।

...अब देखिए, चुनाव हो रहे हैं लेकिन खोजने पर भी कहीं पीठासीन या उनके सक्षम अधीनस्थ कर्मचारी नहीं मिलेंगे। न पुलिस को इसकी चिंता है कि सही से क़ायदे-कानूनों का पालन हो। चुनावों के दौरान झूठ बोलना, एक-दूसरे को गाली-गलौच करना आम हो जाता है।

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता को राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों से रूबरू कराया जाए और जो उम्मीदवार बना है, उसके जीवन और कार्य के बारे में सही जानकारी देकर सचेत किया जाए।

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने और पढ़ाने वाले छात्र-शिक्षक इस काम को अगर ईमानदारी से करें (जिसमें वे सक्षम हैं) तो ये संभव है कि हमारे राजनैतिक जीवन में जो गिरावट या कमजोरी आई है, अस्थायित्व आया है, स्वार्थीपन आया है, उसे हम दूर कर सकते हैं।

क्या इतनी सी अपेक्षा करना ज्यादा होगा इन (छात्र-शिक्षकों) से?

इस पवित्र कार्य की तुलना आप राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने से करेंगे, तो ये गलत होगा। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जब दिन-प्रतिदिन राजनीति में गिरावट, भ्रष्टाचार बढ़ने की बातें हो रही हैं, तो ऐसे में कहीं से भी ये ख़बर सुनने में नहीं आती कि फलां विधान/लोकसभा क्षेत्र में लोगों ने मिलकर अपने जनप्रतिनिधियों की आलोचना की हो, उन्हें बुरा-भला कहा हो।

इसलिए, मतदाताओं की शिक्षा और उनकी जागरूकता को राष्ट्रीय महत्व दिया जाए और इन्हें करने के लिए पूरे देश में संस्थाओं का निर्माण किया जाए।

(लोकनायक जयप्रकाश नांरायण द्वारा साल 1970 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्रों और शिक्षकों को दिए गए संबोधन का एक भाग। स्रोत:- एन अनडॉक्युमेंटेड वन्डर - द मेकिंग ऑफ ग्रेट इंडियन इलेक्शन, एस.वाई. क़ुरैशी)