उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अौर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों अपने भाषणों में एक फरवरी को अाने वाले अाम बजट का ज़रूर ज़िक्र कर रहे हैं। जिसका मर्म यह कि केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार बीते तीन साल में तो अच्छे दिन नहीं ला पाई लेकिन उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनावों से ठीक पहले लाए जा रहे अाम बजट में लोगों को भरमाने के लिए अच्छे दिन का टोटका जरूर करेगी।

कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन अौर लोक-लुभावन चुनाव घोषणा-पत्र जारी कर उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में मजबूत माने जा रहे अखिलेश मोदी सरकार के बजट को लेकर फिक्रमंद क्यों है? दरअसल अाम बजट की तारीख़ को मार्च के अंत से बदल कर एक फरवरी करने के मोदी सरकार के फैसले अौर इसी दौर में विधानसभा चुनावों के होने से उपजी राजनीति अखिलेश की फ़िक्र की भी वजह है। जहाँ अर्थशास्त्र पर राजनीति-शास्त्र हावी होता दिख रहा है। उल्लेखनीय है कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही कई विपक्षी दलों ने चुनाव अायोग से अपील की थी कि वह एक फरवरी को अाम बजट पेश करने पर रोक लगाए वरना केन्द्र सरकार लुभावनी घोषणाएं कर इन राज्यों की जनता के वोट प्रभावित करेगी।

विपक्ष के इन अारोपों पर केन्द्र व सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का तर्क था कि अाम बजट पूरे देश के लिए होता है न कि राज्यों के लिए लिहाजा राज्य विधानसभाअों के चुनाव के हवाले से बजट पर रोक की मांग बेमानी है। अब चुनाव अायोग ने भी बजट पेश करने से रोक की विपक्ष की मांग नहीं मानी है। अलबत्ता उसने केन्द्र सरकार से यह अपेक्षा जरूर की है कि वह जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, यानी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के लिए बजट में न तो कोई घोषणा करेगी अौर न ही इन राज्यों में केन्द्रीय योजनाअों के असर का कोई उल्लेख। अायोग का यह फरमान इसलिए ताकि बजट के जरिए इन राज्यों के वोटरों को प्रभावित करने का कोई प्रयास न हो।

क्या इतने भर से बजट के जरिए सियासत की संभावनाअों के हालात ख़त्म हो जाएंगे? ऐसा लगता नहीं क्योंकि चुनावी राज्यों को समर्पित घोषणाअों के इतर भी ऐसे बहुत से उपाय हो सकते हैं जिसके जरिए वोटरों को लुभाने की कोशिश की जा सकती है। खास कर तब जब देश अभी भी नोटबंदी के फैसले के प्रभाव से उबरने में जुटा है। जिसके कारण असंगठित क्षेत्र में रोजगार खत्म होने व बाजार में खरीद की प्रवृति बंद होने से अर्थव्यवस्था में अाम तौर पर मंदी की बातें अर्थशास्त्री कर रहे हैं।

नोटबंदी से बड़ी अाबादी को परेशानी हुई यह उत्तर प्रदेश सरीखे विशाल राज्य के 75 जिलों में फैले 403 विधानसभा क्षेत्रों से अा रहीं चुनावी रिपोर्टें भी कह रही हैं। वोटरों के इस तबके को राहत देने के लिए अाम बजट में उपाय हो ही सकते हैं क्योंकि इसका लाभ सिर्फ यूपी या बाकी चुनावी राज्यों की जनता को ही नहीं बल्कि देश की बाकी अाबादी को भी मिलेगा।

ऐसी घोषणाअों में अायकर के मोर्चे पर राहत के ऐलान से नौकरीपेशा तबके वाले बड़े मध्य वर्ग को लुभाया ही जा सकता है, इसी तरह कारोबारियों को करों के मामले में राहत, किसानों के लिए घोषणा, सबके लिए न्यूनतम कमाई या यूनिवर्सल इनकम स्कीम सरीखी नई योजना लाकर खास तौर पर गरीब तबके को लाभ देने, सस्ते अावास व रोजगार सृजन की घोषणाएं ऐसी हो सकती हैं जिन पर चुनावी राज्यों की अाबादी को टार्गेट किए जाने की तोहमत भी नहीं लग सकेगी लेकिन इन राज्यों में मध्य वर्ग, व्यापारी, युवा, किसान अौर गरीब हर तबके के वोटरों को खुश करने की कोशिश जरूर की जा सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार ऐसी कोशिश से परहेज भी नहीं करेगी क्योंकि इन राज्यों के चुनावों, खास तौर पर उत्तर प्रदेश के नतीजों के सियासी मायने भारतीय जनता पार्टी बखूबी जानती है। 2017 में यहाँ नाकामी 2019 में दिल्ली में दोबारा सरकार बनाने की हसरतों पर असर डाल सकती है। इसका अहसास अखिलेश यादव को भी है इसलिए वह भी बजट का इंतजार कर रहे हैं। इसके पूरे अासार हैं कि यूपी का चुनावी रण ‘कौन जनता का असली हितैषी’ की लगातार तेज़ होने वाली सियासी बहस में तब्दील होगा अौर उस बहस के केन्द्र में अाम बजट की घोषणाअों की अहम भूमिका होने की संभावना है। अर्थशास्त्र बनाम राजनीति-शास्त्र की यह बहस दिलचस्पी होने वाली है इसमें कोई शक नहीं !