देश में जनप्रतिनिधि संस्थाओं अर्थात व्यवस्थापिकाओं में 'बढ़ती अव्यवस्था' जैसे हमारी संसदीय प्रणाली का एक अभिन्न अंग बन गयी है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश में व्यवस्थापिका के संयुक्त अधिवेशन में राज्यपाल श्री रामनाइक के प्रति जिस प्रकार समाजवादी पार्टी के विधायकों ने अशोभनीय आचरण किया उससे न केवल सदन की मर्यादा कम हुई वरन जनता भी शर्मसार हुई। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल और राजस्थान से लेकर पश्चिमी-बंगाल तक कोई भी राज्य हो, सब जगह यह संक्रामक रोग लगा हुआ है। अधिकतर व्यवस्थापिकायें वाद-विवाद के मंच की जगह किसी मछली-बाज़ार की तरह लगती है और कभी-कभी तो स्कूल-कॉलेज के छात्र-संघों को भी मात कर देती हैं जब वहाँ कुर्सियां फेंकी जाती हैं, माइक से एक दूसरे पर प्रहार किया जाता है और सदन के कूप में आकर नारेबाजी की जाती है।
नयी नहीं हैं विधामंडलों में हंगामा करने की ये घटनाएं
पंजाब विधानसभा में 14 सितम्बर 2016 को तो हद ही हो गई जब कांग्रेस के एक विधायक ने एक मंत्री बिक्रम मजीठिया को जूता फेंक कर मारा और उसके पूर्व कांग्रेस के विधायकों ने दो रातों से सदन में धरना दिया। इससे भी ज्यादा अनके गंभीर मामले पूर्व में हो चुके हैं। वर्ष 1988 में तमिलनाडु में एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी जानकी और जयललिता के बीच संघर्ष के परिणामस्वरूप सदन में हिंसा हुई और पुलिस को आकर सदन के अन्दर लाठी-चार्ज करना पड़ा। नवंबर 1997 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में कल्याण सिंह सरकार से बसपा ने समर्थन वापस ले लिया और ऐसा हंगामा हुआ जिसमें सदस्यों ने एक-दूसरे पर माइक, पेपर-वेट, गिलास और कुर्सियां फेंकी। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। ऐसा लगता है जैसे देश में व्यवस्थापिका के सदस्यों को 'संसदीय लोकतंत्र का ककहरा' भी नहीं पता।
पांच वर्ष पूर्व 2012 में तमिलनाडु विधानसभा के डायमंड जुबली कार्यक्रम में बोलते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुकर्जी ने सभी राजनीतिक दलों से संसद और विधान सभाओं में इस स्थिति को रोकने के लिए ‘सामूहिक चिंतन’ करने की सलाह दी थी और यह आशा की थी कि उसके लिए नए नियम बनेगे। उन्होंने शालीनता और संसदीय प्रक्रिया के घटते महत्व तथा वाद-विवाद और विमर्श पर कम समय दिए जाने पर चिंता व्यक्त की थी। व्यवस्थापिका को बहुमत के आधार पर काम करना होता है जिसमें विपक्ष को बहुमत के निर्णयों को स्वीकार करना होता है और सत्तापक्ष को अल्पमत का सम्मान करना। लोकतंत्र तो सुशासन, विकास और लोक-कल्याण के लिए होता है न कि सस्ती ‘लोकप्रियता की स्पर्धा’ के लिए। आज जब संसद और विधानसभा की कार्यवाही का सजीव प्रसारण किया जाता है तब तो यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि सदन के अंदर सभी का व्यवहार मर्यादित हो।
इस हंगामे की जड़े कहाँ हैं?
आख़िर क्या वज़ह है ऐसे असंसदीय और अशोभनीय आचरणों की? इसकी एक वज़ह यह है कि भारतीय समाज ने लोकतांत्रिक राजनीति को तो एक झटके में स्वीकार कर लिया लेकिन राजनीति को न तो कभी गरिमापूर्ण व्यवसाय या क्रियाकलाप की मान्यता दी और न ही स्कूल-कॉलेज में लोकतांत्रिक विरोध की गरिमा व तौर-तरीकों के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की।
दूसरे, देश में समाज का संरचनात्मक ढांचा सामंतवादी रहा जिसमें परिवारों में बच्चों को अपने से बड़ों से तर्क करने या उनसे प्रश्न करने को अनुशासनहीनता माना गया और उनको अपनी बात कहने की आज़ादी या प्रोत्साहन नहीं दिया गया, जिससे उन्हें बचपन से विरोध के स्वरों को शालीनता से प्रकट करने का कोई अवसर ही नहीं मिला। इससे हमारी कई पीढ़ियों को परिवार व समाज में अपने विचारों को सहज, शालीन और तर्कपूर्ण ढंग से रखने का कोई व्यवहारिक अनुभव न प्राप्त हुआ। समाज से निकले जन-प्रतिनिधि जब राजनीति में पहुंचे तो उसी अनुभवहीनता के कारण वे लोकतांत्रिक-विरोध के मान्य तौर-तरीकों से नावाकिफ थे। जिसको जैसे समझ में आया उसने उसी ढंग से विरोध प्रकट करना शुरू कर दिया। कहा ही गया है कि ‘जब तर्क न हो तो चिल्लाइए’। यही हमारी व्यवस्थापिकाओं में हो रहा है।
समाधान क्या हो?
व्यवस्थापिकाओं में अव्यवस्था की समस्या किसी नियम-कानून से हल होने वाली नहीं। इसके लिए हमें व्यापक जागरूकता का प्रयास करना पड़ेगा। न केवल राजनीतिक दलों को प्रशिक्षित करना पड़ेगा कि वे लोकतांत्रिक विरोध के तौर-तरीकों और संस्कृति को अपने जन-प्रतिनिधियों में भरें, वरन हमें समाज में एक आन्दोलन चलाना पड़ेगा कि पारिवारिक स्तर पर अभिभावक अपने बच्चों से संवाद और विमर्श को प्रोत्साहित करें तथा उनको प्रश्न करने और अपने बड़ों के निर्णयों को चुनौती देने की शालीन और मृदुभाषी पद्यति सिखाएं।

आज जब देश में विभिन्न स्तरों पर लोकतांत्रिक संस्थाएं काम कर रही हैं और जनता की निष्ठा उनमें बनी हुई है तो ज़रुरत इस बात की है कि हम उन संस्थाओं को मज़बूत करें न कि उनमें आये विकारों का हर समय रोना रोते रहें। यदि बिना ज्ञान के डॉक्टर इलाज करें, शिक्षक पढ़ायें, वैज्ञानिक शोध करें और इंजीनियर पुल और हवाई जहाज बनायें तो जनता का जो हश्र होगा उसका अनुमान हम सभी बखूबी लगा सकते हैं। इसी प्रकार, लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और संस्कृति के ज्ञान से विरत राजनीतिज्ञों को यदि हम अपने जन-प्रतिनिधि चुनते रहेंगे तो यथा-स्थिति बनी रहेगी और संसदीय लोकतंत्र चीत्कार करता रहेगा। अक्सर अपराधी और गलत लोगों के चुने जाने पर तो हम सभी को यह ताना दिया ही जाता है कि जब जनता ने उनको चुना है तो आपको क्या कष्ट है? तो क्या मतदान करना ही मतदाता के समक्ष एकमात्र विकल्प है? क्या मतदान करके उसका उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है? क्या मतदाता को अपनी अगली पीढ़ी के बारे में सोचने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं? समय आ गया है जब हमें ‘मतदाता’ की भूमिका से आगे निकल कर ‘लोकतांत्रिक-प्रहरी’ की भूमिका का निर्वहन करना होगा जिससे हमारा वर्तमान भावी-लोकतंत्र के लिए एक अभिशाप न बने।
(लेखक सेंटर फॉर दि स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स (सीएसएसपी) कानपुर के निदेशक हैं)