उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए समाजवदी पार्टी अौर कांग्रेस के गठबंधन के बाद अखिलेश यादव अौर राहुल गांधी रविवार यानी 29 जनवरी को लखनऊ में पहली बार एक मंच पर अाए। ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ को मुख्य नारा बनाकर उतरे दोनों युवा नेताअों के बोल, एक-दूसरे के प्रति बर्ताव अौर अतीत को पीछे छोड़, अागे देखने का रवैया, राजनीति में एक नई केमिस्ट्री बनने के संकेत भी दे गया। जिसकी धमक 2017 के यूपी चुनावों से अागे 2019 के लोकसभा चुनावों में भी दिख सकती है।

साल 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद पहली बार उसका अौर कांग्रेस का किसी चुनाव में गठबंधन हुअा है। पुराने जनता परवार से निकली समाजवादी पार्टी की केन्द्रीय राजनीति ही कांग्रेस विरोध की रही जबकि यूपी में मंडल बनाम कमंडल की राजनीति में जमीन गंवाती गई कांग्रेस अपने समर्थन अाधार में सेंध के लिए समाजवादी पार्टी को जिम्मेदार मानती रही।

लिहाजा दोनों के एक साथ अाने की सियासी संभावनाअों को हमेशा नकारा जाता रहा लेकिन मुलायम सिंह यादव अौर सोनिया गांधी जो न कर पाए, वह राहुल गांधी अौर अखिलेश यादव ने कर दिखाया। उत्तर प्रदेश की पारंपरिक राजनीति से परे हट कर यह नए प्रयोग की तरह है जिसकी कमान दो युवा नेताअों ने संभाली है। अतीत के खट्टे संबंधों के बोझ को अागे ढोने के लिए वे तैयार नहीं, यह लखनऊ में दोनों ने बार-बार साफ किया।

संदेश स्पष्ट है कि दोनों अागे की राजनीति देख रहे हैं अौर उन्हें अहसास है कि इसके लिए साथ जरूरी है। हालांकि दोनों ने प्रेस कांफ्रेस में 2019 में भी गठबंधन की संभावनाअों को यह कहते हुए टाला कि उसके बारे में वक़्त अाने पर फैसला करेंगे। भविष्य की राजनीति के लिए यदि अखिलेश-राहुल दूरगामी लक्ष्य लेकर चल रहे हैं तो वे विकल्प खोले रखना चाहते हैं। जिसमें अखिलेश के सहारे यूपी में राहुल अौर राहुल के साथ से राष्ट्रीय राजनीति में अखिलेश अपनी जगह तलाशने की कोशिश करेंगे। रविवार को दोनों ने लखनऊ में जो कहा, उसमें भारतीय जनता पार्टी उनके निशाने पर रही। वहींं बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती के प्रति अपेक्षाकृत नरमी भविष्य के संकेतों की चुगली करती दिखी।

राहुल ने कहा कि वे मायावती का सम्मान करते हैं अौर बसपा की नीतियां भाजपा जैसी देश बांटने वाली नहीं। वहीं कांग्रेस के साथ गठबंधन में बसपा को न शामिल करने के सवाल पर अखिलेश ने सीधे इंकार नहीं किया अलबत्ता उन्होंने कहा कि उनका चुनाव चिह्न ही इतना बड़ा (हाथी) है कि काफी जगह लेता है। ऐसे में उन्हें (मायावती को) इतनी जगह (सीटें) कैसे दे सकते थे? अागे उन्होंने जोड़ा कि उनके व राहुल के लिए इतनी जगह दे पाना संभव नहीं था।

यानी नब्बे के दशक में मुलायम सिंह यादव अौर मायावती के बीच शुरू हुई खटास अौर व्यक्तिगत नापसंदगी वाली सियासत ढाई दशक में बदलती लग रही है। क्या यह सब 2019 की अगली बड़ी चुनावी लड़ाई से पहले मोदी विरोधी मोर्चे में नए खिलाड़ियों को शामिल करने की गुंजाइश बनाए रखने की अोर इंगित कर रहा है? इसका जवाब वक़्त देगा लेकिन फिलहाल इतना तो एकदम साफ है कि 2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में जो सियासी खिचड़ी पक रही है उसके बहाने सियासी तड़का अागे भी लगता रहेगा!