संविधान के अनुच्छेद 334 में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए 10 वर्ष की आरक्षण की अवधि तय की गई थी,ताकि उन्हें सामान्य श्रेणी के लोगों के बराबर लाया जा सके।इस अवधि को प्रत्येक 10 साल के लिए बढ़ाया जाता रहा है।इसकी वजह से देश के 543 सांसदों में 79 अनुसूचित जाति और 41 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो जाते है उसी तरह विधानसभाओं 3961 सीट में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए आरक्षित है।यानि सीट पर वोट सभी डालते है पर प्रतिनिधि आरक्षित हो जाते है। पिछली बार 2009 को इसे फिर से 10 साल के लिए बढ़ा दिया गया और कुछ क्रांति न हुयी तो 2019 में भी शायद ऐसा ही हो।परन्तु इतने वर्ष बीत गए पर शायद ही कुछ सुधार हुआ है इनकी स्थिति में सिवाय जनप्रतिनिधियों के आर्थिक और सामाजिक हैसियत के।यह देखने,सोचने और समझने वाली बात है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी एक भी अनुसूचित जाती / जनजाति सामान्य नहीं बन पाए।जबकि बहुत लोगों का जीवन-स्तर आज की तारीख में सामान्य श्रेणी से भी उच्च है।अगर इन शश्रेणियों के दस लोग भी छाती ठोक कर कहते कि वे सामान्य श्रेणी के हो गए हैं,उन्हें सामान्य श्रेणी में डाल दिया जाए तो बात समझ में आती। वे सामान्य श्रेणी में आने के बात क्या कहेंगे,उल्टे सामान्य श्रेणी के लोग ओबीसी बनने के लिए आंदोलन चला रहे हैं कुछ और लोग वर्तमान श्रेणी से नीचे की श्रेणियों में जाने के लिए प्रयासरत हैं।ऐसा भी नहीं हुआ की इन जनप्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्र का विकास किया या कम से कम अपने श्रेणी के लोगों को ऊपर उठाने में जोर लगाया हो। संसद में 120 से अधिक संख्या है इनकी और इनका एक ग्रुप भी होता है पर कभी किसी मुद्दे पर एकजुट होते देखा नहीं गया इनको, जबकि हाल के वर्षों में बहुत सी दलित विरोधी घटनाएं घटी।

प्रश्न उठना लाजमी है कि आखिर सरकारें प्रत्येक देश साल पर इस पर विचार-विमर्श क्यों नहीं करवाती है और क्यों नहीं पूछा जाता है कि इसे बंद किया जाये या जारी रखा जाये ? अगर जारी रखा जाये तो किन सुधारों के साथ? क्योंकि इन क्षेत्रों में आमतौर पर एक चौथाई लोग ही अनुसूचित जाती/जनजाति श्रेणी के होते है, बाकि लोगों का विकास किसी न किसी स्तर पर तो अवरुद्ध हो ही रहा है। आखिर लोग कब तक ऐसे लोगों को अपना नेता चुन सकेंगे जो कालांतर में बेअसर और कमजोर साबित होते है? जैसे आपने एक मशीन खरीदी किसी काम के लिए पर वह मशीन हर बार ख़राब हो जा रही तो क्या आप उसे वैसे ही चलने की कोशिश करेंगे या उसे बनवाएंगे अथवा नयी मशीन लाएंगे। अगर इतनी सी बात नीतिनिर्धारकों को समझ नहीं आ रही तो कुछ तो गलत है सरकारी तंत्र में यह मानने के अलावा कोई चारा नहीं है।