बचपन में हम लोग जब भी क्रिकेट खेलने जाते थे तो सबके मन में यह रहता था कि कैसे भी कर के पहले बल्लेबाज़ी का मौका मिल जाए..! लेकिन यह निर्णय तो सिक्का उछाल (टॉस) कर होता था। तब लगता था के काश... सिक्के के दोनों पहलु हमारे हों, ताकि परिणाम जो भी आए, फायदे में हम ही रहें!

खैर, बचपन भी बीत गया पर आज तक ऐसा कभी नहीं हो पाया! लेकिन कुछ लोग अभी भी इतने भाग्यशाली हैं कि सिक्के का चित्त भी इनका और पट्ट भी इन्ही का होता है। लेकिन ये 'लोग' क्रिकेट नही, जन-मानस के साथ खेलते हैं। ये कोई और नहीं बल्कि हमारे कॉमरेड और अति-बुद्धिजीवी हैं जिनके निशाने पर हमेशा भाजपा और संघ (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) रहता है। 'सेकुलरिज्म' और 'उदार सोच' के ये तथाकथित ठेकेदार हर बहस को अपनी शर्तो में ला खड़ा करने में महारथ हासिल कर चुके हैं और यदि कोई भी इस बात को दुनिया के सामने लाने की कोशिश करे तो वो तुरंत ही 'संघी', 'ट्रोल', 'भक्त' आदि उपाधियों से नवाज़ दिया जाता है। सबसे बुरी हालत तो राष्ट्रवादी या दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाली छात्राओं की होती है जिनको न सिर्फ एक से एक अश्लील, भद्दे, व्यंग, तंज़ और गालियाँ सुनाई जाती हैं, बल्कि इनके साथ तो सहानुभूति के लिए भी कोई समाजसेवी या महिला अधिकारों वाली 'एक्टिविस्ट' भी नहीं आते। ऐसे में ये ‘निर्भीक’ और स्वतंत्र विचार रखने वाली महिलाएं करें तो करें क्या?

ऐसा भी नहीं के ये कोई अपवाद हो जो केवल सोशल मीडिया में होता हो। दुर्दशा देखनी हो इनकी तो ज़रा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़ी महिला कार्यकर्ता या इस संगठन से सहानुभूति रखने वाली किसी छात्रा से पूछिए जिसको उसकी 'वाम' और 'नारीवादी' (फेमिनिस्ट) सहेलियां ही हॉस्टल-मेस, क्लास, सेंटर आदि किस-किस जगह और किस-किस तरह के ताना मारती हैं? पर क्या करें? सहना पड़ता है... आखिर वामपंथियों के दृष्टिकोण में 'हर' महिला का सम्मान एक समान थोड़े हो सकता है। वामपंथियों के लिए ठीक यही बात जॉर्ज ओरवेल ने अपनी पुस्तक ‘एनिमल फार्म’ में कही थी जो कुछ यूँ है..."सभी जनावर एक समान होते हैं लेकिन कुछ जानवर दूसरों के मुक़ाबले कुछ ज्यादा ही समान होते हैं" (All animals are equal, but some animals are more equal than others)

खैर, उनकी दुर्दशा की चर्चा तो कभी ख़त्म न होने वाला मुद्दा है। आखिर जेएनयू इतना क्रांतिकारी जो ठहरा! फिर भी इस उम्मीद के साथ ये लिख रहा हूँ कि शायद किसी दिन कोई 'वृंदा' (करात) किसी 'स्मृति' (इरानी) का दर्द समझेगी!

वामपंथी संगठन अपनी सुविधानुसार बहस के मसलों को तय करते हैं और फिर अपने से असहमति रखने वालों को भिन्न (उपर्युक्त) 'विश्लेषणों' से नवाज़ते हैं। और विश्वास मानिए कि भाजपा (और इससे जुड़े संगठन भी) इनके इस चक्रव्यूह में फंसती भी रही है। शायद इसी का नतीजा था कि पहले 2004 में हार, फिर 2009 में और भी बुरी हार... क्योंकि भाजपा का पारंपरिक मतदाता एक तरह से दिग्भ्रमित हो चुका था कि आखिर भाजपा की विचारधारा क्या है?

शायद इसी चीज को पहचानते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने कदम दिल्ली को ओर रखने शुरु किए। शेष 2014 में जो हुआ वह इतिहास है।

दरअसल, 2014 में मोदी (भाजपा) को मिला जनादेश कांग्रेस की 'प्रच्छन्न वामपंथी' राजनीती के मूंह में एक ज़ोरदार तमाचा था। ये एक नए विचार का उद्घोष था जिसका सबसे ज्यादा डर वामपंथियों को था। और हो भी क्यों न... आखिर आज़ादी के बाद से ही कांग्रेस के राज में इनको हर तरह की मलाई खाने की आदत जो हो गई थी और हर सामाजिक या शिक्षण-संस्थान में इन्होने गहरी जड़े जमा के रखीं थी। इसीलिए अपने इस एकाधिकार रूपी विशेषाधिकार खोने का भय इनको चिंतित कर रहा था।

वैसे राजनैतिक रूप से तो इनका सफाया काफी पहले ही हो गया था पर रही सही कसर 2014 में पूरी हो गई जब ये मात्र 11 लोकसभा सीटों पर सिमट गए। लेकिन इनकी राजनीतिक दुर्बलता को इनकी धूर्तता का अंत मानना एक बड़ी भूल है। इनकी असली शक्ति तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कुंडली मार कर बैठने में है। यही से ये हर चर्चा और वाद-विवाद की रूप-रेखा तय करते हैं। इस तरह से पक्ष और विपक्ष दोनों ही इनकी शर्तों के अधीन हो जाता है। हास्यास्पद तो यह है कि जिस विचारधारा का मूल ही अन्य विचारों को 'सेंसर' करने में है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवाज़, आज सबसे ज्यादा उसी से आ रही है। चलिए मान भी लेते हैं कि इनकी मांग जायज़ है। यह एक संविधानिक अधिकार भी है लेकिन इसमें कुछ अलग ही मसला है। क्या इनकी मांग सबके लिए है? यानि क्या ये सबकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं या फिर सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्र के एकाधिकार (मोनोपोली) को बनाए रखने के लिए लड़ रहे हैं? सिक्के के दो पहलु हैं। एक है सामाजिक और दूसरा है न्यायिक... इन दोनों ही पहलुओं में इनकी नियत और नीति पर गहरे प्रश्नचिन्ह लगते हैं।

सामजिक रूप से देखा जाए तो क्या ये लोग समाज के हर एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये खड़े होते हैं, हुए हैं या होंगे? क्या ये लोग तस्लीमा नसरीन के लिए खड़े हुए हैं? क्या इन्होने सलमान रश्दी की पुस्तक पर प्रतिबंध के विरुद्ध आवाज़ उठाई या फिर उसके लिए कोई गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें वो अपने विचार रख सकें। और तो और क्या उन्होंने तारेक फ़तेह के संबोधन रद्द करवाने पर या उनके साथ बद्सलुकी होने पर सड़कों पर, संसद में या सोशल मीडिया पर ही कोई स्वर बुलंद किये? जवाब है 'नहीं' और ऐसा होगा भी नहीं क्योंकि इनके द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल उन्हीं के लिए मांगी जाती है जो हिंदुओं, भाजपा, संघ और यहाँ तक कि देश के खिलाफ बोलते हैं। अन्य कोई भी व्यक्ति, जो इनके विचारो से सहमत न हो या इनके विरुद्ध लिखे-बोले, उसकी स्वतंत्रता से इनको कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे व्यक्ति का भाषण ‘द्वेषपूर्ण’ और ‘ज़हरीला’ माना जाएगा जिस पर यह लोग रोक लगाने की मांग करेंगे।

दूसरा पहलु है न्यायिक... आज कई लोग अपने आप को 'संवैधानिक-देशभक्त' कहते फिर रहे हैं। ये कहते हैं के इनको अपने देशप्रेम का प्रमाण संघ से नहीं चाहिए और हमारी देश-भक्ति देश के संविधान से उत्पन्न होती है जो हमें बोलने की आज़ादी देता है। चलिए मान लेते हैं। लेकिन यही 'अल्पविद्या भयंकरी’ का उदाहरण है!.जो संविधान इनको बोलने की आज़ादी देता है वही संविधान कई ज़िम्मेदारियां भी इसके नागरिकों को देता है। जैसे वो ये भी कहता है भारत राज्यों का संघ है, जिसमे कोई भी राज्य भारत से अलग नहीं हो सकता। देश की एकता, अखंडता ,संप्रभुता के विरुद्ध उठे स्वर और गतिविधियों पर रोक लगाने का आह्वाहन  भी यही संविधान करता है। बाबा साहेब ने संविधान बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि आने वाले समय में भी देश की एकता और अखंडता पर कोई आंच न आने पाए। तो क्या बाबा साहेब के संविधान को ये लोग गलत मानते हैं? या फिर उसको केवल तोड़-मरोड़ के इस्तेमाल करना चाहते है? इनकी मंशा किसी भी आम नागरिक को सशंकित कर देती है। इनका पहला अखाड़ा है देश के शिक्षण संस्थान। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी रूप से देश के टुकड़े करने की स्वतंत्रता नहीं है। अलगावादी विचारधारा जो आज वामपंथ के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है और जिसकी सूची में अब 'बस्तर मांगे आज़ादी' भी आ चुका है वो पूरे देश के लिए घातक है। न के केवल संघ के लिए बल्कि हर व्यक्ति को इस देश की रक्षा करनी होगी फिर चाहे उसको 'संघी' ही क्यों न बनना पड़े!