उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जनादेश इतना प्रचंड है कि उसके साये में बाकी चार राज्यों के चुनाव परिणाम 'गौण' महसूस होते हैं। इसकी बड़ी वजह संभवतः राष्ट्रीय राजनीति पर उप्र के प्रभाव का अनुपात है। इस दौर में चुनाव वाले पांच राज्यों में 102 लोकसभा सीटें हैं। उनमें से 80 अकेले उप्र में हैं! जाहिर है, उसके प्रभाव का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।
गोवा और मणिपुर से तो लोकसभा के सिर्फ दो-दो सदस्य चुने जाते हैं। अगर राष्ट्रपति चुनाव (जो आने वाली जुलाई में होना है) में इन राज्यों के विधायकों के वोट का मूल्य देखें, तो जहाँ उप्र के एक विधायक के वोट की कीमत 83,824 होती है, वहीं गोवा के विधायक का मूल्य महज 800 है। इस दौर में पंजाब उप्र के बाद दूसरा सबसे बड़ा राज्य था। वहाँ से लोकसभा के 13 सांसद चुने जाते हैं, जबकि राष्ट्रपति चुनाव में वहाँ के विधायक के मत का मूल्य 13,572 है। इन परिस्थितियों में अगर उप्र का चुनाव परिणाम बाकी राज्यों से उभरे नतीजों पर हावी हो गया, तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है।
बहरहाल, छोटे से छोटे राज्य के बाशिंदों की निगाह से देखें, तो उनके अपने राज्य का चुनाव भी उतना ही अहम है, जितना किसी बड़े राज्य के निवासियों की निगाह में वहाँ का निर्वाचन होता है। अतः उप्र की 'चुनावी सुनामी' के बीच भी पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा से आए चुनाव परिणामों और उनके राजनीतिक निहितार्थों पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए।
पंजाब में सत्ताधारी अकाली दल-भाजपा गठबंधन कमजोर विकेट पर है, ये धारणा 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से बनने लगी थी। हालांकि उस चुनाव में भी इस गठबंधन ने राज्य की 13 में से 6 सीटें जीतीं। 35.2 फीसदी वोट प्राप्त किए। लेकिन ‘मोदी लहर’ के पैमाने पर इस प्रदर्शन को फीका माना गया। तब सबसे ज्यादा ध्यान नवोदित आम आदमी पार्टी (‘आप’) की अप्रत्याशित सफलता ने खींचा। ‘आप’ को 4 सीटें और 24.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। हालांकि कांग्रेस ने 33.2 फीसदी वोट पाए, लेकिन वह तीन सीट ही जीत पाई। तब से मीडिया में ‘आप’ को पंजाब में एक गंभीर दावेदार माना गया था। फरवरी 2015 में दिल्ली में अपनी अभूतपूर्व जीत के बाद ‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल ने अपना सबसे ज्यादा ध्यान पंजाब पर ही लगाया।
लेकिन अब वहाँ से आए नतीजों से उन्हें मायूसी होगी। ‘आप’ ने वहाँ इस बार लगभग 24 फीसदी वोट हासिल किए हैं। यानी लोकसभा चुनाव में मिले जन-समर्थन की रक्षा करने में वह कमोबेश सफल रही है। इसके बावजूद कि लोकसभा चुनाव में जीते चार में से तीन सांसद केजरीवाल का साथ छोड़ गए। कई अन्य महत्त्वपूर्ण नेता भी पार्टी से अलग हो गए। इस लिहाज से केजरीवाल के लिए ये प्रदर्शन संतोषजनक होना चाहिए था। परंतु उन्होंने और उनकी पार्टी ने उम्मीदें इतनी ज्यादा जोड़ लीं कि 20 सीट पाना और मुख्य विपक्षी दल बनना भी उन्हें अपर्याप्त महसूस होगा।
दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए न सिर्फ इस दौर में, बल्कि लोकसभा चुनाव के बाद के वर्षों में पंजाब एक सिल्वर लाइनिंग (चमकती रेखा) के रूप में उभरा है। पार्टी ने लोकसभा चुनाव के बाद अपने वोटों में तकरीबन पांच फीसदी की बढ़ोतरी की है। 117 सदस्यीय विधानसभा में 78 सीटें जीती हैं। पंजाब की जीत उसके लिए इसलिए खास है, क्योंकि अगर यहाँ अकाली-भाजपा गठबंधन की अलोकप्रियता का लाभ ‘आप’ उठा ले जाती, तो संदेश यह जाता कि लोग अब कहीं और किसी विकल्प के रूप में कांग्रेस को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर खुद भाजपा के मुख्य विकल्प के रूप में पेश करने का ‘आप’ का दावा मजबूत होता। लेकिन अब ये स्थिति उलट गई है।
पंजाब का नतीजा ‘आप’ की राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाओं को करारा झटका है। गोवा में जोर-शोर से चलाए गए प्रचार अभियान के बावजूद उसे हाथ लगी नाकामी ने इन जख़्म पर और नमक छिड़का है। गोवा में ‘आप’ तकरीबन 6 फीसदी वोट पाने में सफल रही, लेकिन सीट एक भी हाथ नहीं लगी। इसके बाद इस पार्टी का राष्ट्रीय विस्तार दुष्कर हो जाएगा। इस साल आखिर में होने वाले चुनाव में गुजरात को अपना अगला किला बनाने की उसकी महत्त्वाकांक्षा को अब शायद ही कोई गंभीरता से लेगा।
हालांकि कांग्रेस गोवा में जीत नहीं पाई, लेकिन उसने सत्ताधारी भाजपा को कड़ी टक्कर दी है। वोट प्रतिशत में भाजपा उससे लगभग 5 फीसदी आगे रही। मगर सीटों के मामले के लिए उनमें कांटे की टक्कर हुई। गोवा फॉरवर्ड पार्टी को तीन सीटें मिली हैं। इसके साथ पहले कांग्रेस ने गठबंधन किया था, लेकिन बाद में तोड़ लिया। इस पर अब उसे जरूर अफसोस होगा। खैर, फिलहाल तो गोवा फॉरवर्ड और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एक सीट) को लेकर सरकार बनाने का अवसर भी कांग्रेस ने गंवा दिया है। हालांकि, भाजपा को लगातार दूसरी बार सीधी जीत से रोक कर राज्य की राजनीति में अपने को प्रासंगिक बनाए में रखने में वह सफल रही है।
मगर मणिपुर में भाजपा ने उसका दबदबा तोड़ दिया। वोट प्रतिशत में उससे आगे रह कर भाजपा ने इस उत्तर-पूर्वी राज्य में चमत्कृत करने वाला प्रदर्शन किया है। सीटों के मामले में भी उसने कांटे की टक्कर दी। जैसे गोवा में कांग्रेस अपने संभावित सहयोगी दलों के साथ कुछ आगे दिखती है, वही स्थिति मणिपुर में भाजपा के साथ है। दो नगा पार्टियों को सात सीटें मिली हैं। एक सीट लोक जनशक्ति पार्टी को मिली है। एक निर्दलीय विजयी हुई है। इन सबको जोड़ कर भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच चुकी है है। ऐसा हुआ तो लगातार तीन कार्यकाल से जारी कांग्रेस के शासन का अंत होगा तथा एक अन्य राज्य इस पार्टी के हाथ से निकल जाएगा।
उत्तराखंड निर्विवाद रूप से उसके साथ से निकल चुका है। यहाँ भाजपा ने जबरदस्त जीत हासिल की। लगभग 46 फीसदी से ऊपर वोट हासिल किए। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में उसने लगभग 9 फीसदी वोट गंवाए, लेकिन उससे ‘सुनामी’ जैसा जनादेश पाने में कोई रुकावट नहीं आई। 70 में से 57 सीटों का अभूतपूर्व बहुमत पार्टी ने प्राप्त किया है।
कुल मिलाकर इस दौर के चुनाव के बाद भाजपा का प्रभाव क्षेत्र विस्तृत और गहरा हुआ है। इन चुनाव नतीजों ने खास तौर पर दो बातों पर मुहर लगाई है। एक, सियासत का मोदी ब्रांड लोकप्रिय बना हुआ है। दूसरा, नोटबंदी के फैसले से भाजपा को फायदा हुआ। इसके संकेत विभिन्न राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों से भी मिल रहे थे। अब उन पर अंतिम मुहर लग गई है। इन निष्कर्षों से केंद्र में भाजपा खुद को अधिक आश्वस्त एवं स्थिर महसूस करेगी।
दूसरी तरफ विपक्ष के लिए चुनौतियां गहरा गई हैं। कांग्रेस के लिए पंजाब की जीत उत्तराखंड की हार और मणिपुर में जमीन खोने की भरपाई नहीं कर सकती। और फिर उत्तर प्रदेश है, जहाँ समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने का उसका दांव गलत पड़ा और उसने स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे खराब प्रदर्शन किया है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी खुद को दिग्भ्रमित महसूस कर रही होंगी। खासकर बसपा का भविष्य अंधकारमय हो गया है, जैसा कि ‘आप’ की संभावनाएं हो गई हैं।