उत्तर प्रदेश के 2012 के तत्कालीन चुनाव में जब सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो हम जैसो के साथ साथ तमाम जनता को यह आशा बंधी थी कि उन्हें बसपा के तानाशाही-पूर्ण रवैये से मुक्ति मिलेगी लेकिन हुआ इसके विपरीत। प्रदेश में सपा के लोगो द्वारा भी दबंगई ही की जाती रही। इसके साथ-साथ विभिन्न नियुक्तियों व चयन प्रक्रियाओं में भी भारी धांधली उजागर हुई। विगत कुछ वर्षों में कोई भी ऐसी भर्ती-प्रक्रिया नहीं थी जो निर्विवाद और बिना किसी धांधली के संपन्न हुई हो। हर भर्ती प्रक्रिया “न्यायालय” जरुर पहुची है। इसके अलावा प्रशासन में भी इस सरकार का रवैया कुछ संतोष जनक नहीं रहा। कुछ ईमानदार छवि वाले अधिकारियों के कठोर निर्णय और जनहितकारी फैसलो में भी सरकार का रवैया भेदभावपूर्ण ही रहा था।
ऐसे कुछ प्रमुख निर्णयों की एक बानगी देखिए...
सबसे पहला मुद्दा आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल का था। गौतम बुद्ध नगर यानी नोएडा में तैनात दुर्गा शक्ति नागपाल ने अवैध रेत खनन माफ़ियाओं के खिलाफ अभियान चलाया जिसके परिणामस्वरूप इन्हें जुलाई 2013 में निलंबित कर दिया। हालांकि भारी आलोचनाओ के बाद पुनः बहाल किया गया।
एक आईपीएस अमिताभ ठाकुर को मुलायम द्वारा पहले फोन पर धमकी दिया जाना और फिर निलंबन भी चर्चा में रहा।
अमिताभ ठाकुर ने मुलायम सिंह के खिलाफ 10 जुलाई को उन्हें धमकाने की शिकायत दर्ज करवाई थी परिणामस्वरूप ठाकुर को 13 जुलाई को विभिन्न आरोप जैसे अनुशासनहीनता, महात्मा गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने,शासन विरोधी कार्य और उच्च न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करने के आरोप लगा कर निलंबित कर दिया गया।
लेकिन ऐसी ख़बरें भी पर्याप्त आईं कि ये मामला भी अवैध खनन से जुड़ा था। इसके साथ ही इसी दिन एक महिला ने भी अमिताभ ठाकुर पर बलात्कार की शिकायत दर्ज करवा दी जिसमे उनकी पत्नी को भी सहाभियुक्त बनाया गया है। जो अमिताभ ठाकुर के अनुसार सपा मुखिया मुलायम सिंह का "रीटर्न गिफ्ट" था!
इसके साथ ही एक अन्य आईएएस अधिकारी विजय शंकर पाण्डेय ने भी प्रदेश सरकार पर ईमानदार अधिकारियो को परेशान करने का अरोप लगाया था।
प्रदेश सरकार के इस तरह के कार्यों की सूची बहुत ही लंबी थी जिसमें पत्रकारों पर हमले, पुलिस की गुंडागर्दी व सपा कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी दादागीरी जैसे कार्य शामिल थे।
उत्तर प्रदेश सरकार के ये कारनामे तो बानगी भर हैं। अगर समाचार पत्रों का अवलोकन किया जाये तो इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी होगी कि एक-दो लेख में इनका वर्णन शायद ही संभव हो।
हाल के कुछ वर्षों में प्रदेश में बलात्कार जैसी घटनाओ में बहुत तेजी दिखी है, जिसका कारण आम लोगों में कानून और व्यवस्था का डर का न रह जाना हो सकता है। क्योंकि जब तक सरकार पुलिस पर इन मामलो में तेजी से कार्यवाई करने का दवाब नहीं डालेगी, इस तरह के अपराधियों के हौसले बुलंद रहेंगे।
जिस प्रकार की सरकार का सपना हमारे युवाओं ने अखिलेश यादव के साथ देखा था वह पूरी तरह से टूट चुका था। फिर ये प्रश्न भी हमेशा बना रहा कि प्रदेश की कमान वास्तव में किसके हाथ में थी? स्वयं अखिलेश यादव के हाथ में? या मुलायम सिंह या उनके चाचा-ताऊ रामगोपाल या शिवपाल या मामा के हाथो में?
सपा सरकार की ये नीतियां इन्हीं के लिए विनाशकारी साबित हुई। जिस तरह का माहौल अभी प्रदेश में चल रहा था, जनता उससे त्रस्त आ चुकी थी। शायद यही वजह रही कि हाल में हुए चुनावों में प्रदेश की जनता ने अपने परिपक्व और समझदार होने का प्रमाण दे कर इन्हें आईना दिखाया है।
जिस प्रकार के नतीजे इन चुनावों में प्राप्त हुए है वो उत्तर प्रदेश की जनता के पिछली (अखिलश यादव) सरकार से खिन्न हो जाने का ही प्रमाण है। इसके साथ ही स्थापित होने वाली सरकार से उत्तर प्रदेश की जनता को उम्मीदें बहुत है। अब देखने वाली बात कि नयी सरकार चुनौतियों से निपटती कैसे है!