उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने करीब एक साल पहले जब विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू की थी तब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उसे नाम दिया था मिशन 265+... यानी यूपी की 403 में से कम से 265 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करना!

राजनीति के पंडितों को तब लगा था कि भाजपा अध्यक्ष अव्यवहारिक बात कर रहे हैं। अब, जब चुनाव के नतीजे सामने अा चुके हैं तो साफ है कि अमित शाह अपने लक्ष्य को लेकर किसी गफलत में नहीं थे अौर भाजपा के उनके सिपाहियों ने उसे न सिर्फ हासिल किया बल्कि 300 सीटों के पार जाने का 'असंभव' सा लगने वाला लक्ष्य भी हासिल कर लिया।

गौरतलब है कि जैसे-जैसे चरणवार मतदान निपटने लगा था तो भाजपा के कुछ रणनीतिकार 300 सीटें जीतने का दावा करने लगे थे। चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया कि उनका वह अाकलन भी सही था। चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि यूपी में भाजपा के प्रति वैसा ही समर्थन कायम है जैसा करीब ढाई साल पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में था।

भाजपा का यह प्रदर्शन 1991 में राम मन्दिर अांदोलन के उस दौर में मिली जीत से भी कहीं अागे निकल गया जब पार्टी ने 221 सीटें जीत कर बहुमत की सरकार बनाई थी। अाखिर ऐसा क्यों हुअा कि भाजपा को मंदिर के मुद्दे से भी ज्यादा बड़ी चुनावी सफलता इस बार मिली? दरअसल इसका बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व अौर नब्बे के दशक में उभरी मंडल की राजनीति को भाजपा द्वारा यूपी चुनाव में नए कलेवर के साथ अपनाने को जाता है। मंडल की राजनीति ने यदि गए ढाई दशक में यूपी में समाजवादी पार्टी अौर बहुजन समाज पार्टी को मजबूती दी तो 2017 के इस चुनाव में मंडल पार्ट-2 के जरिए भाजपा ने अपनी जीत की इबारत लिखी।

भाजपा संगठन ने ]टीम वर्क' के जरिए मंडल पार्ट-2 को जमीन पर उतारा तो वहीं नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार के फैसलों अौर अपनी चुनाव प्रचार शैली से उसे भरपूर ताकत देकर जिताऊ गठजोड़ में तब्दील कर दिया। नरेंद्र मोदी यूपी के चुनाव में निर्विवाद रूप से सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे अौर भाजपा द्वारा किसी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट न किए जाने के बावजूद लोगों ने मोदी के प्रति भरोसे के कारण भाजपा को वोट किया। वहीं संगठन ने पार्टी का नया वोट बैंक बनाने, बूथ स्तर तक पार्टी को मजबूत करने, गए एक साल से लगातार चुनाव की तैयारियों से जुड़ी जमीनी गतिविधियों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

जब समाजवादी पर्टी पारिवारिक कलह से जूझ रही थी अौर बहुजन समाज पार्टी परिदृश्य से नदारद थी, जिसे उसका 'खामोशी से काम करना' माना जा रहा था, तब भाजपा अति पिछड़ा वर्ग, महिला, युवा, दलित अौर व्यापारी तबके के लिए अलग-अलग सम्मेलनों में जुटी थी। बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताअों के साथ कई स्तर की बैठकें हो चुकी थीं अौर सभी 403 विधानसभा इलाकों में भाजपा के परिवतर्न रथ पहुंच चुके थे। यानी पार्टी संगठन का पूरा जोर इस पर था कि चुनाव होने से पहले के पूरे एक साल में भाजपा ही गांव-देहात, कस्बों अौर शहरों में सबसे विजिबल यानी लोगों के बीच दिखने वाली पार्टी के रूप में उभरे। अमित शाह ने प्रदेश स्तर पर इसकी देखरेख की जिम्मेदारी उस प्रदेश महामंत्री सुनील बंसल को सौंपी जिन्हें शाह 2014 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ लेकर अाए थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से निकले सुनील बंसल अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की उम्मीदों पर खरे उतरे।

पार्टी ने सबसे नया अौर कामयाब प्रयोग अपने लिए नया वोट बैंक बनाने के मामले में किया। सवर्णों व बनियों की पार्टी के तमगे को उतारकर अमित शाह एंड टीम ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों व दलितों में जाटवों से इतर अन्य जातियों का नया समीकरण बनाने में कामयाबी पायी। यह कुछ वैसा ही प्रयोग था जैसा नब्बे के दशक में कल्याण सिंह ने भाजपा का नया अाधार बनाने के लिहाज से किया था अौर कामयाबी भी पाई थी। इसे अौर विस्तार देते हुए भाजपा के मौजूदा नेतृत्व पिछड़ों के खास तबके की नुमाइंदगी करने वाले अपना दल अौर भारतीय समााज पार्टी से गठबंधन भी किया।

इस नए प्रयोग का ही नतीजा रहा कि भाजपा ने 177 सवर्ण प्रत्याशियों के अलावा जिन 128 पिछड़ी जाति से प्रत्याशी बनाए उनमें 120 गैर-यादव थे अौर इनमें भी करीब 50 उन पिछड़ी जाति के जिन्हें अत्यंत पिछड़ा होने की श्रेणी में रखा जाता है। जब वोट पड़े तो भाजपा के पक्ष में सवर्णों के उसके पारंपिरक वोट के साथ ये जातियां मजबूती से गोलबंद हो गईं। नतीजतन पार्टी ने वैसी दर्जनों सीटों पर भी इस बार जीत हासिल कर ली जहाँ पहले कभी उसका खाता नहीं खुला था। भाजपा की यह नई सोशल इंजीनियरिंग (सामजिक-जातीय समीकरण) यूपी में अब तक ताकतवर रहीं दोनों पार्टियों सपा अौर बसपा के लिए अागे भी खतरे की घंटी है क्योंकि कल तक पिछड़ों व दलितों का जो बड़ा धड़ा उनके साथ होता था, वह भाजपा के पाले में खिसक गया है।