मत या वोट क्या है? जानते हैं न आप? मत की शक्ति क्या है? ये भी जानते होंगे? फिर क्यों आगे पढ़ रहे हैं? कुछ खास होगा इस पोस्ट में, ये मानकर आगे पढ़े चले जा रहे हैं?

ठीक है। पढ़ते रहिए। लेकिन पहले याद कीजिए कि मत की शक्ति के बारे में किस कक्षा में पढ़ना शुरु किया था? 6th में या 5th में... शेष तो आप आज भी मत की शक्ति के बारे में सुन ही रहे होंगे... चुनाव जो उत्तर प्रदेश की फिज़ाओं में हैं!

लेकिन क्या वास्तव में एक नागरिक के तौर पर हम इस शक्ति के बारे में जानते हैं? दिमाग पर जोर देकर फिर पूछिए... जानते हैं?

सबको पता होता है तभी तो जब हमारे यहाँ बिजली का बिल ज्यादा आ जाता है या बिजली आती ही नहीं, कहीं घूस देनी पड़ती है, जब परेशानी होती है तो सोचते हैं कि सब कुछ अच्छा कैसे होगा? कैसे अच्छी सरकारें आएंगी जो आपकी परेशानी तुरंत दूर कर सकें? लेकिन फिर भी आप नहीं उठते, फिर भी आप नहीं सुनते!

'शायद' आप जानते हैं। तभी तो जब से चुनावों की घोषणा हुई है... व्हाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर पर इस बार भ्रष्टचारियों को सबक सिखाने, सरकारों को उखाड़ फेंकने की कसमें-वादे किए जा रहे हैं!

आपको याद होगा कि पिछली बार कब किसी विधायक या मंत्री के जेल जाने की ख़बर पर आपने खुश होकर प्रतिक्रिया जताई थी? भले 3-4 दिनों के लिए ही सही, जब उस विधायक या मंत्री को जेल हुई थी तो आपने अपने व्हाट्सअप पर उस पर और सरकार चुटकुले बनाते हुए कहा था कि अब इन्हें चुनावों में पता चलेगा?

लेकिन अब तो चुनाव आ गए हैं। पता चलेगा की बात याद है...? क्या हुआ? घर से बहुत दूर हैं? ऑफिस से छुट्टी क्यों लूँ? क्या सोच रहे हैं अब आप? एक वोट डालने से क्या बनेगा और क्या बिगड़ेगा? तो देखिए... क्या बनता है और क्या बिगड़ता है। तीन उदाहरण... जिन्हें समय चक्र की गति के अनुरुप भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. क़ुरैशी साहब की किताब एन अनडॉक्युमेंटेड वन्डर - द मेकिंग ऑफ ग्रेट इंडियन इलेक्शन से साभार लिया गया है।

मध्य प्रदेश में हुए 2008 विधानसभा चुनावों में धर विधानसभा क्षेत्र से बालमुकुंद शर्मा एक वोट से चुनाव हार गए थे। इस चुनाव में जहाँ उन्हें 50,509 वोट मिले थे वहीं एक वोट से जीतने वाली नीना विक्रम वर्मा को 50,510 वोट!

दूसरा उदाहरण पहले से ज्यादा रोचक है। और ये विश्वास मानिए... तीसरा और भी रोचक है!

इस उदाहरण में हम सबके प्रिय भारत रत्न वाजपेयी जी की बात... साल 1998 की बात है। इस समय गठबंधन सरकारों का सफल दौर शुरु हुआ ही था। वाजपेयी जी 13 महीने की सरकार चला चुके थे कि तभी विपक्ष ने वाजपेयी जी से बहुमत सिद्द करने की मांग रख दी। इस सबके पीछे सोनिया जी और (दिवगंत) जयललिता की प्रसिद्ध चाय पार्टी को याद किया जाता है। कहा जाता है कि इसी चाय पार्टी से अन्नाद्रमुक ने राजग (भाजपा गठबंधन) सरकार से समर्थन वापस करने का फैसला किया। समर्थन वापस के वाद विश्वास मत पर मतदान हुआ और वाजपेयी जी एक वोट से हार गए! उस वक़्त का वाजपेयी जी का संसद में दिया गया भाषण पढ़ने और सुनने लायक है। हालांकि उस एक वोट पर नैतिक-अनैतिक पक्ष की आज भी चर्चा होती है लेकिन हमें आज उस बहस में नहीं पड़ना है, हमें तो बस एक वोट की शक्ति जाननी है।

तीसरा, सबसे रोचक उदाहरण! आपको न सिर्फ विश्वास दिलाता हूँ बल्कि दावा भी करता हूँ कि ये उदाहरण आपको ऐसा याद होगा कि आप इसे दूसरों को सुनाया करेंगे! साल था 2008 का... राज्य राजस्थान... चुनाव थे विधानसभा के... और व्यक्ति जिनके नाम पर ये कहानी कहने की नौबत आई, का नाम सी.पी. जोशी, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष। अपनी मेहनत और लगन के बल पर प्रदेश की कमान संभाले हुए जोशी जी को सन 2008 में लगभग पाँच साल हो चुके थे। 2008 तक उन्होंने पार्टी को इस मुक़ाम तक पहुँचाया कि वो विधानसभा चुनाव में बहुमत पाकर सरकार बना सके और सरकार बनी भी... पार्टी अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता होने के कारण ये स्वाभाविक था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें ही मिले लेकिन ऐसा हो न सका! पता है क्यों? जब वोटों की गिनती हुई तो पता चला सी.पी. जोशी साहब को 62,215 मत मिले जबकि उनके प्रतिद्नंदी को... ठीक अनुमान लगाया आपने... 62,216 मत। एक मत से चुनाव हार गए...! लेकिन रुकिए... कहानी अभी बाकि है। सी.पी. जोशी के घर के दो सदस्यों ने मतदान ही नहीं किया था! इतनी भारी कीमत चुकाई जोशी जी ने... अगर जीतते तो पाँच साल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलती लेकिन... हारे, वह भी अपनों के आलस से कारण जो मत की शक्ति न जा सके थे!

इन तीन उदाहरणों के बाद फिर भी कुछ न सूझे तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को पढ़ लीजिए अगर आप मतदान नहीं करते तो आपको सरकार को दोष देने का कोई हक नहीं

उम्मीद है अब आप नहीं कहेंगे कि एक वोट से क्या होता है? कहीं ऐसा न हो कि आपके एक वोट न डालने से एक उदाहरण आपकी विधानसभा का भी इसमें जुड़ जाए... तो निकलिए और वोट डालिए!

इस पोस्ट को कॉपी करके आप अपने ब्लॉग, किसी वेबसाइट या फेसबुक पर, कहीं भी लगा सकते हैं। इसमें मेरा या 'ऑफप्रिंट' का नाम देने की भी आपको कोई जरुरत नहीं है। अपने नाम से चिपकाइए... बस वोट डलने चाहिए क्योंकि लोगों की भागीदारी का नाम ही लोकतंत्र है और जितनी ज्यादा भागीदारी होगी, उतना ही खिलखिलाता लोकतंत्र होगा!