स्नातक के अंतिम वर्ष की परीक्षा में राजनीति शास्त्र के पर्चे में एक बहु-विकल्पीय (Optional) प्रश्न आया था-

लोकतंत्र के लिए कौन सी प्रणाली सबसे अच्छी होती है?

a-एक दलीय, b-द्विदलीय, c-बहुदलीय, d-इनमें से कोई नहीं

अपने अनुभव से आप भी जानते हैं कि विकल्प a और d तो कतई हो ही नहीं सकता। अब बात अटकती है कि द्विदलीय या बहुदलीय...?

मुझे लगता है ये प्रश्न ही वाहियात था। ये तो व्यक्तिनिष्ट प्रश्न था जिसे जबर्दस्ती वस्तुनिष्ट बनाकर पेपर में डाल दिया गया था। इस प्रश्न का जवाब तभी से खोज रहा हूँ। लेकिन जवाब अभी तक नहीं मिला... कई विद्वान लोगों से चर्चा करते हुए पूछा भी लेकिन कोई जवाब नहीं! इस बात को लेकर इसलिए भी असमंजस हो सकता है कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका लगभग द्विदलीय है वहीं दुनिया के सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत के बाग में दर्जनों दलों के फूल खिले हैं!

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खैर... आगे बढ़ते हैं। लाल कृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा मेरा देश, मेरा जीवन (अंग्रजी में My country, My life) में लिखते हैं कि "भाजपा ने देश की राजनीति को द्विदलीय भले ही न बनाया हो लेकिन उसने इस (राजनीति) को द्विध्रुवीय (Bipolar) जरुर बना दिया" जिसमें भाजपा से पहले तक सिर्फ एक लेफ्ट या लेफ्ट टू द सेंटर (वाम या वाम की ओर झुकाव) था लेकिन भाजपा के रुप में राईट या राईट टू द सेंटर (दक्षिण या दक्षिण की ओर झुकाव) आ गया। निश्चित रुप से यह आडवाणी जी का बड़प्पन है जो द्विध्रुवीयता का क्रेडिट वह भाजपा को दे रहे हैं, जबकि ऐसा करने वाले वे स्वयं ही हैं, जिन्होंने भाजपा को इस मुकाम तक पहुँचाया था।


भारतीय राजनीति के 180 डिग्री घूमने की जो बात आडवाणी जी उस समय कर रहे थे, लगता है वह 180 डिग्री फिर घूम चुकी है। तीन साल में एक दलीय लोकतंत्र न सही लेकिन भारत फिर 'एक ध्रुवीयता' की ओर बढ़ रहा है, जहाँ भाजपा के नेतृत्व में सिर्फ एक ध्रुव चमकता दिखाई दे रहा है?

26 मई 2017 के साथ ही सरकार ने तीन साल पूरे कर लिए हैं। 2014 से लेकर अब तक मोटा-मोटी भाजपा की राजनीतिक सफलता का ग्राफ बिहार और दिल्ली के रुप में दो गर्तों के साथ लगातार नई उचांइयों को छू रहा है, जिसका पीक (उच्चतम बिंदू) आना शायद अभी शेष है। वहीं एक समय 'एकछत्र' शासन करने वाली कांग्रेस के उभरने की संभवना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही। हम 2004 जैसे चमत्कार की उम्मीद कर सकते हैं लेकिन ध्यान रखिए कि एक, चमत्कार बार-बार नहीं होते और दूसरा, गांधी नेहरु खानदान से अपने आप को जोड़ने वाली पी़ढ़ी बढ़ते हुए समय के साथ अप्रसांगिक (लगभग खत्म) हो चली है, जो कहती थी कि उन्होंन कांग्रेस के अलावा आजतक किसी दूसरे को वोट ही नहीं दिया। तीसरी बात, जो भले 2004 में कांग्रेस के उभार में नदारद थी, वह यह कि नेतृत्व का गुण और जनता से सीधा जुड़ाव किसी पार्टी की नियति तय करता है। इस मामले में देखें तो कांग्रेस नेतृत्व कहीं नहीं दिखता। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने 2007 में उत्तरप्रदेश विधानसभा के अवसर पर कहा था कि "कांग्रेस उत्तर प्रदेश के लोगों की ज़िंदगी में कहीं नहीं है और राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भला कर सकें, इतना पुरुषार्थ उनमें नहीं है"। उनके इस निष्कर्ष में अगर हम 'उत्तर प्रदेश' की जगह पूरे 'भारत' को रख दें तो शायद ही सच्चाई में कोई अंतर आए। कई लोग मान सकते हैं कि कांग्रेस की वर्तमान हालात के पीछे इसका एक परिवार के प्रति समर्पित होना है, तो नहीं भूलना चाहिए पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोनी वाली 'विचारधारा' के अभाव के वाबजूद अगर कांग्रेस जमीं रही तो उसके पीछे यही परिवार का अटूट बंधन ही था। हाँ, यह ठीक है कि आज परिवार के प्रति वह प्रेम या आत्मीयता नहीं दिखती, ऐसे में अगर पार्टी परिवार से इतर कोई प्रयोग करती है तो बिखरने की प्रबल संभवानाएं हैं। वैसे भी रोज-रोज होने वाले एक-दुक्का समर्पित (committed) नेताओं के दलबदल भविष्य की कांग्रेस का चेहरा दिखा रही है।


भारत का भूगोल और कांग्रेस की राजनीति:

भारत नदियों का देश है। भारत के इसी भूगोल से अगर हम कांग्रेस की राजनीति को समझने की कोशिश करें तो याद करने में आसानी होगी।

कांग्रेस उस नदी के इलाके से सत्ताहीन हो चुकी है जिससे होते हुए एक समय अपने देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा था, सिंधू। कांग्रेस उन राज्यों से ख़त्म हो चुकी है, जहाँ से पतित-पावन, मोक्षदायिनी गंगा बहती है।

यह उन राज्यों से भी ख़त्म हो चुकी है जहाँ भारत की दूसरी सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र बहती है। कांग्रेस उन राज्यों से समाप्त हो चुकी है जहाँ से दक्षिण की सबसे बड़ी नदी और दक्षिण की गंगा कही जाने वाली नदी गोदावरी बहती है, (अपवाद-पांडिचेरी)। इस क्रम में हम नर्मदा, ताप्ती, महानदी, साबरमती, गोमती जैसी प्रमुख नदियों को रख सकते हैं। जिस गति से मोदी लहर चल रही है और जैसे हालात कांग्रेस के हैं, उनमें कहा जा सकता है कि आने वाले समय में यह उस इलाके से भी सिमटने जा रही है, जहाँ से उत्तर में यमुना (हिमाचल प्रदेश) और दक्षिण में कृष्णा और कावेरी (कर्नाटक) बहती है। हाँ, इन सबसे बीच पंजाब कांग्रेस के लिए राहत की ख़बर लाया है जो एक ही झटके में पाँच नदियां कांग्रेस के खाते में आ गईं हैं!

जहाँ भी भाजपा को चुनौती मिल रही है और जो भी इसे चुनौती देने की स्थिति में सक्षम हो पा रहा है, वहाँ कांग्रेस की शायद ही कोई भूमिका हो। वहीं भाजपा की जीत का मानसून उन प्रदेशों में दस्तक देने की संभावनाएं तलाश रहा है जहाँ अभी तक उसका कोई अस्तित्व नहीं था। केरल और पश्चिम बंगाल इस कड़ी में भले अपने आप को एकाध दशक बचाकर रख सकते हैं लेकिन आने वाले समय में ओडिशा या पूर्व-उत्तर का कोई प्रदेश कब अपने को चटख भगवा रंग में रंग ले... कुछ कहा नहीं जा सकता।

चुनाव आयोग की नियमावली के अनुसार यूं तो अपने यहाँ 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दलों का दर्जा प्राप्त है लेकिन जिस तरह से बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव-दर-चुनाव प्रदर्शन गिर रहा है, उससे लगता नहीं कि ये अपना नेशनल स्टेटस बहुत दिनों तक बरकार रख पाएंगी। अगर जैसे-तैसे राष्ट्रीय दल होने का दर्जा बचा भी लिया तो भाजपा के लिए कोई गंभीर खतरा पेश कर पाएंगी, ये तो कतई नहीं लगता। ऐसे में उन संभावनाओं पर भी विचार करना ठीक रहेगा जो भाजपा को रोकने की क्षमता रख सकती हैं।


शुरुआत साम्यवादियों से की जाए... साम्यवादियों की यहाँ सिर्फ इसलिए याद करना जरुरी हो जाता है कि इन्हें एक समय भारतीय सत्ता का 'वैकल्पिक दावेदार' माना जाता था। उत्तर प्रदेश विधानसभा और दिल्ली नगर निगम चुनाव के बाद, वर्तमान स्थिति में इनके नेतृत्व को लगता है कि वामपंथ का समर्थन पूरे भारत के युवाओं, खासकर विश्वविद्यालयों में बढ़ रहा है! अगर ऐसा दावा वृंदा करात का हो तो इसमें कहने में जरा भी संदेह नहीं रह जाता है कि किस हद तक वामपंथी नेतृत्व जमीनी हक़ीक़त से कट चुका है। ज्यादा स्पष्टता के साथ कहूँ तो साम्यवादी पार्टियों की राजनीति को देखकर दूर-दूर तक ये आभाष नहीं होता कि चुनौती देना तो दूर, वे ठीक से अपने पैरों पर खड़े भी हो पाएंगे। भारतीय राजनीति में अप्रसांगिक हो चुका वाम अब ख़त्म होने की ओर दिख रहा है।

कुछ (अल्प) समय के लिए आम आदमी पार्टी के रुप में यह उम्मीद फिर जगी (ऐसी उम्मीद करने वालों में मैं भी था) लेकिन जिस तरह की इस पार्टी की संरचना है और जो बातें इसके शीर्ष नेतृत्व की रहती हैं, उससे उम्मीद तोड़ देने में ही भलाई लगती है।


ऐसे में मोदी विरोधियों के लिए सिर्फ यही बचता है कि वे उन गैर-भाजपा विकल्पों की ओर देखें जो कम से कम 10 बर्षों से सत्ता में हैं और जिन्हें निकट भविष्य में भाजपा से कोई खतरा नहीं दिखाई देता। इस श्रेणी में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी का नाम सबसे ऊपर हो सकता है लेकिन ममता दीदी का का गुस्सा, कार्यशैली, वामपंथियों से उनकी राजनीतिक शत्रुता... जैसे कुछ गति-अवरोधक उन्हें हाशिए पर धकेलते हैं। वैसे तो कुछ समय पहले तक कई लोग नितीश कुमार को मोदी या भाजपा विरोध का झंडा थामने के लिए एकदम उपयुक्त मानते थे लेकिन लालू यादव पर लगने वाले आरोपों से असहज नितीश कुमार में संभवाना देखने वाले कम अब हो गए हैं। ऐसे गंठबंधन को हम 'तीसरे मोर्चा प्लस कांग्रेस' का नाम दे सकते हैं, जो तीसरा नहीं बल्कि 'दूसरा मोर्चा' होगा। यह कुछ-कुछ वैसा ही गंठबंधन होगा जिसके बलबूते पर अटल जी ने पहली बार गैर-कांग्रसी सरकार को पूरे पाँच साल चलाया था। इसके अलावा लगता नहीं कि निकट भविष्य में किसी ऐसे चमत्कारिक नेता का उभार हो सकता है जो 2024 (2019 की संभावना तो स्वयं विपक्ष भी नकार चुका है) में लहर के प्रभाव को निष्क्रीय कर सके।

इन सबसे के बीच मुस्लिम तुष्टिकरण एक ऐसा मसला है, जिससे अजीज आकर ही लोगों ने नरेंद्र मोदी को हाथों-हाथ लिया और इतना प्रचंड बहुमत दिया है। इस मसले पर ममता बनर्जी उसी लीक पर चलती हुई दिख रही हैं, जिसने मोदी लहर को आवश्यक (और शायद प्रमुख रुप से भी) गति दी थी। भाजपा और भाजपा के विरोधी भी, इस बात का दावा कर सकते हैं कि 2014 में जो बहुमत मिला था, वह सिर्फ और सिर्फ विकास के लिए था। जबकि वास्तविकता में ऐसा था नहीं। चुनावों में वोट सिर्फ विकास के मुद्दों पर नहीं मिलते, ये मन ही मन भले सब माने लेकिन सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने से कतराते हैं। जब तक मोदी विरोधी विकास से इतर इस 'तुष्टिकरण से उपजी नाराजगी' को नहीं समझेंगे... नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा के लिए राहें आसान ही बनी रहेंगी। ऐसे में लगता है कि आडवाणी जी के राजनीतिक शिष्य ही राजनीति को कुछ-कुछ फिर उसी दिशा में दिशा में ले जा रहे हैं जो अटल-आडवाणी युग से पहले यह हुआ करती थी, एक-ध्रुवीयता (Unipolar or Unipolarity)!


कांग्रेस और वामपंथ के आलोचक होने के नाते आप इस पर जश्न मना सकते हैं लेकिन यदि यह स्थिति एक दलीय लोकतंत्र की ओर बढ़ रही है तो निश्चित ही घातक है क्योंकि सबसे ऊपर किेए गए प्रश्न में 'पहले विकल्प' को एक झटके में आप नकार चुके हैं।

(ट्विटर- @AmitBharteey)